अध्याय-1

21 04 2007

नेपाली, मराठी और अन्य कई भारतीय उपभाषाओं की तरह हिन्दी भी देवनागरी लिपी में लिखी जाती है जो संस्कृत के लिए भी सर्व स्वीकार्य लिपी है। हाल ही में लेखन में एकरूपता लाने के लिए और अक्षरों की शक्ल सुधारने के लिए इस लिपी का Central Hindi Directorate, Ministry of Education and Youth Services के द्वारा मानकीकरण हुआ था। इस लिपी में 11 स्वर और 35 व्यंजन हैं।
स्वरः अ a, आ aa, इ i, ई ee, उ u, ऊ oo, ऋ r, ए e, ऐ ai, ओ o, औ au

नोटः अनुस्वर (ं) और विसर्ग (ः) को अक्सर अं और अः की तरह लिखा जाता है वे स्वरों की सूची में शामिल किए जाते हैं। लेकिन वे वास्तव में व्यंजन हैं। स्वर ऋ बहुत सारे संस्कृत से उधार लिए गए शब्दों में उपयोग होता है।

व्यंजनः
क ka, ख kha, ग ga, घ gha, ङ na,
च ca, छ cha, ज ja, झ jha, ञ na,
ट ta, ठ tha, ड da, ढ dha, ण na,
त ta, थ tha, द da, ध dha, न na,
प pa, फ pha, ब ba, भ bha, म ma,
य ya, र ra, ल la, व va,
श sa, ष sa, स sa, ह ha, ड़ ra, ढ़ rha

नोटः सभी व्यंजनों में ‍’a’ अंतर्निहित होता है। ष केवल संस्कृत से उधार लिए गए शब्दों में प्रयोग होता है। ङ, ण, ञ, ड़, ढ़ से कोई भी शब्द शुरू नहीं होता। ङ और ञ कभी अकेले प्रयोग नहीं होते, उनके बाद हमेशा एक व्यंजन होता है। व्यंजनों के ऊपर कभी कभी चंद्रबिंदु (ँ, जैसे अँ, आँ आदि) का प्रयोग होता है। ये व्यंजन को अनुनासिक बनाता है। यानि वह व्यंजन नाक के द्वारा बोला जाता है। फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी से उधार लिए गए शब्दों के लिए व्यंजनों के पैर में बिंदु लगाया जाता है, जैसे क़, ख़, ग़, ज़, फ़। ॉ (ऑ) अंग्रेज़ी के शब्दों को दर्शाता है जैसे ऑफिस, कॉलेज।





योग-5 || 3-आसन

14 04 2007

आसन एक वैज्ञानिक पद्धति है। ये हमारे शरीर को स्वच्छ, शुद्ध व सक्रिय रखकर मनुष्य को शारीरिक व मानसिक रूप से सदा स्वस्थ्य रख सकते हैं। इनका लाभ प्रतिदिन अभ्यास करने से ही मिल सकता है।

केवल आसन ही एक ऐसा व्यायाम है, जो हमारे अंदर के शरीर पर प्रभाव डाल सकता है। शरीर और मन का स्वस्थ रहना हमारे शरीर के आंतरिक अंगों के ठीक प्रकार से कार्य करने पर निर्भर करता है।

अंदर के अंग हैं: हृदय, फेफड़े, पाचन संस्थान, बहुत सी ग्रंथियां, मूत्र संस्थान, मस्तिष्क नाड़ियां इत्यादि। स्वस्थ रखना शरीर का अपना काम है। प्रकृति ने शरीर में इस प्रकार की सारी व्यवस्था कर रखी है, जिससे उसे (शरीर को) स्वस्थ रखा जा सकता है और हर प्रकार के रोगों से बचाया जा सकता है।

नाड़ी सूत्रों तथा मस्तिष्क से ही पूरे शरीर का संचालन होता है। मस्तिष्क तथा नाड़ी संस्थान दोनों को स्वस्थ रखने के लिए योग के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।

योगियों ने ऐसे आसन, प्राणायाम आदि का वर्णन किया है, जिनके अभ्यास से शरीर एवं मन पर संयम रखा जा सकता है। स्थिरम् सुखमासनम (यो.सू.) शरीर स्थिर रहे तथा मन को सुख प्राप्त हो, इस प्रकार की स्थिति आसन है।

लौकिक कर्मो में शरीर को अधिक कसने का नाम प्रयत्न है। इस प्रयत्न में शरीर को अधिक न थकाना, प्रयास की शिथिलता यानी सामान्य निवृत्ति, शरीर को विश्राम की स्थिति में रखने और प्रभु का ध्यान करने से आसन की सिद्धि होती है। आसन की सिद्धि ने नाड़ियों की शुद्धि, आरोग्य की वृद्धि एवं स्फूर्ति प्राप्त होती है।

आसन दो प्रकार के होते हैं

1. प्राणायाम: ध्यान आदि के लिए, जैसे पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन।
2. शरीर तथा मन को निरोग रखने के लिए पश्चिमोत्तानासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, गोरक्षासन, जानुशिरासन, सुप्तवज्रासन, उष्ट्रासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, हलासन, मकरासन, पवनमुक्तासन, सवाøगासन, मत्स्यासन, शीर्षासन इत्यादि।

इनसे शारीरिक बल, यौवन, आंतरिक अवयव और अंतर्ग्रन्थियों की कार्यक्षमता बढ़ती है तथा शरीर का सर्वागीण विकास होता है। योगासन तथा मन को स्वस्थ व शांत रखकर आयु लंबी करने और आजीवित युवा रहने का लाभ अवश्य ले सकते हैं।





योग-4 || 2-नियम

14 04 2007

योग के आठ अंगों में नियम दूसरी पायदान है। योगासन के अन्य अंगों की तरह नियम भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
नियम का पालन व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है, ये भी पांच प्रकार के हैं- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान।

यम दूसरों के साथ व्यवहार से संबंधित हैं और नियम निज के पालन के लिए हैं।

शौच : शरीर तथा मन की पवित्रता शौच है। पवित्रता दो प्रकार की होती है, बाह्म और आंतरिक। मिट्टी, उबटन, त्रिफला साबुन आदि लगाकर जल से स्नान करने से त्वचा एवं अंगों की शुद्धि होती है और काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार आदि को त्याग कर मन शुद्ध होता है सत्याचरण से।

ईर्षा, द्वेष, तृष्ण, अभियान, कुविचार व पंच क्लेशों को छोड़ने से तथा दया, क्षमा, नम्रता, स्नेह, मधुर भाषण तथा त्याग से आंतरिक पवित्रता आ जाती है।

संतोष : शरीर के पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त धन से अधिक की लालसा न करना। न्यूनाधिक की प्राप्ति पर शोक या हर्ष न करना संतोष है। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जो प्राप्त हो, उसी से संतुष्ट रहना या प्रभु की कृपा से जो मिल जाए, उसे ही प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना संतोष है। जब विचार पूर्वक अपने भाग्य पर विश्वास दृढ़ होगा, तभी संतोष होता है।

तप : सुख-दु:ख, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि को सहन करते हुए मन तथा शरीर को साधना तप है। कुवृत्तियों का सदा निवारण करते रहना, मान, अपमान, हानि, निंदा से भी बुद्धि का संतुलन न खोना, हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार, परिग्रह आदि यम नियमों की विपरीत भावनाओं का दमन करना, विषयों में दौड़ने वाली इन्द्रियों और मन का दमन करते रहना तथा आसक्तियों से स्वयं को हटाए रखना तप है।

स्वाध्याय : अपनी रुचि तथा निष्ठा के अनुसार विचार शुद्धि और ज्ञान प्राप्त करने के लिए सामाजिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक विषयों का नित्य नियम से पठन करना, मनन करना और सत्संग तथा विचारों का अदान-प्रदान करना स्वाध्याय कहलाता है।

ईश्वर प्रणिधान : बुद्धि, नम्रता, भक्ति विशेष तथा पूर्ण तन्मयता के साथ प्रत्येक कर्म को फल सहित, परमात्मा को निर्मल भाव से सानंद समिर्पत करना ईश्वर प्रणिधान कहलाता है।

कर्म किए बिना कोई प्राणी रह नहीं सकता। जो भी कर्म मैं कर रहा हूं, वह प्रभु के आदेशानुसार कर रहा हूं। इसमें कर्तापन में अभियान त्याग का भाव ही प्रबल रहता है।

इस प्रकार उपासक अपनी देह आदि से किए गए सभी कर्म तथा फलाफल प्रभु को सहर्ष अर्पित करता है। फलत: दंभ के कलुष से व्यक्ति का अंत:करण सर्वदा रहित हो जाता है। ये सब शुद्ध मन से ही संभव है।





योग-3 || 6-धारणा

14 04 2007

योग के आठ अंगों में धारणा छठा अंग है। धारणा यानी धारण करना, लेना, जीवन में लाना या ग्रहण करना आदि से संबंधित है।
योग का अर्थ है मिलाप। आत्मा के परमात्मा में मिलन को योग कहा जाता है।
अपने नियमित अभ्यास से योग की साधना करते समय व्यक्ति अंतर्मुखी हो जाता है। उसे सृष्टि परमात्मामय दिखने लगती है। समस्त मानव जाति, पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि सब में परमात्मा दिखने लगते हैं।
स्वयं को स्वयं में स्थिर करने की साधना को धारणा कहते हैं। स्थूल व सूक्ष्म किसी भी विषय में अर्थात हृदय, भ्रुकुटि, नासिका, ॐ शब्द आदि आध्यात्मिक प्रदेश तथा इष्ट प्रदेश देवता की मूर्ति में चित्त को लगाना धारणा कहलाता है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि के उचित अभ्यास के पश्चात यह कार्य सरलता से होता है। प्राणायाम से प्राण वायु और प्रत्याहार से इन्द्रियों के वश में होने से चित्त में दुविधा नहीं रहती, जिससे शांत चित्त किसी एक लक्ष्य पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है।





योग-2 ||1. यम

14 04 2007

योग के आठ अंगों में से यम पहला है, यदि इन आठों में से किसी भी एक को छोड़ दिया जाए तो योगासन अधूरा माना जाता है-
यम पांच हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
अहिंसा: अहिंसा का अर्थ है, कभी भी किसी प्राणी का अपकार न करना, कष्ट न देना। अहिंसा व हिंसा का मुख्य स्त्रोत बुद्धि है। बुद्धि ही भले-बुरे का निर्णय करके वचन तथा कर्म में मन को तैयार करती है। अत: मन, वचन तथा कर्म में हिंसा को पूरी तरह छोड़ देना ही पूर्ण अहिंसा है।
आत्मवत् सर्वभूतेषु (सबको अपने जैसा समझना) ऐसा साक्षात्कार हो जाने पर ही योगी पूर्ण अहिंसक बनता है। ऐसी अनुभूति से जब जीवन रंग जाता है, तब किसी प्राणी के द्वारा कष्ट, अपमान व हानि पाकर भी बुद्धि में उत्तेजना नहीं होती, तभी व्यक्ति को अहिंसावादी कहा जा सकता है।
सत्य: जो व्यक्ति मन, वचन कर्म से समान रहे, अर्थात् एक जैसी वाणी और मन का व्यवहार करना, जैसा देखा और अनुमान लगाकर बुद्धि से निर्णय किया अथवा जैसा सुना वैसा ही वाणी से कह दिया और मन में धारण किया।
अपने ज्ञान के अनुसार, दूसरे व्यक्ति को ज्ञान करवाने में कहा हुआ वचन यदि धोखा देने वाला या भ्रम में डालने वाला न होकर ज्ञान करवाने वाला हो, तभी सत्य होता है। यह वचन उपकारी भी होना चाहिए। सब प्रकार से परीक्षा करके सर्वभूत हितकारी वचन बोलना ही सत्य है।
अस्तेय: दूसरों के पदार्थों की ओर ध्यान न देना, उन्हें चुराने का विचार मन में न लाना तथा धन, भूमि, संपत्ति, नारी विद्या आदि किसी भी ऐसी वस्तु, जिसे अपने पुरुषार्थ से अर्जित नहीं किया या किसी ने हमें भेंट या पुरस्कार में नहीं दिया, को लेने का विचार स्वप्न में भी नहीं आने देना, अस्तेय का पूर्ण स्वरूप कहलाता है। गृहस्थ यदि अति तृष्णा न करे, तो इस दोष से काफी हद तक मुक्त हो सकता है।
ब्रह्मचर्य: प्रभु का ध्यान करते हुए अपनी समस्त इन्द्रियों सहित गुप्तेन्द्रियों पर संयम रखना, विशेषकर मन, वाणी तथा शरीर से यौन सुख प्राप्त न करना ब्रह्मचर्य है।
सभी इन्द्रियों पर यम निमयों के आचरण द्वारा अधिकार प्राप्त करके आत्मोत्थान का प्रयत्न करना, असत्य आचरण, चोरी, मांस भक्षण, खट्टे-तीखे पदार्थ खाना, मादक द्रव्य का सेवन करना, जुआ खेलना, काम क्रोध, लोभ, मोह, मैथुन आदि का त्याग करना ब्रह्मचर्य है।
अपरिग्रह: ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के विषय रूप भोगों के उपयोग में या विषयों का उपार्ज़न व संग्रह करने में, उनकी रक्षा करने, उन्हें स्थिर रखने में हिंसा तथा उनकी क्षीणता में होने वाले कष्टों को देखकर उन पर विचार करके उन्हें मन, वचन, कर्म से स्वीकार न करना अपरिग्रह कहलाता है।
इस प्रकार गुण-दोष की निर्णायक बुद्धि जब इन विषयों को भोगने में पाप तथा हिंसा का निश्चय करती है, तभी अपरिग्रह होता है, अन्यथा यह परिग्रह है, विषय उपभोग है, विषय सेवन है।





योग-1

14 04 2007

योग शास्त्र की रचना महर्षि पतंजलि ने की है, उनके अनुसार योग को अपनाकर आध्यात्मिक उन्नति, ज्ञान, सुख तथा शांति को पाया जा सकता है। चित्त की वृत्तियों का शमन ही योग है। इस प्रकार हम देखें तो पाएंगे कि योग आनंदमय जीवन जीने की एक कला है। पतंजलि ने योग के आठ अंग बताए हैं-
1. यम
2. नियम
3. आसन
4. प्राणायाम
5. धारणा
6. प्रत्याहार
7. ध्यान
8. समाधि





॥ बुधवार व्रत ॥

14 04 2007

बुध ग्रह के कोप को शांत करने के लिए बुधवार का व्रत किया जाता है। जीवन में सभी तरह के सुख-सम्पत्ति और वैभव की प्राप्ति के लिए बुधवार का व्रत करके व्रतकथा सुननी चाहिए। विधिवत व्रत करने से सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन की सभी कामनाएँ पूरी होती हैं।

बुधवार व्रत कैसे करें
इस दिन प्रात: उठकर संपूर्ण घर की सफाई करें। तत्पश्चात स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ। इसके बाद पवित्र जल का घर में छिड़काव करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान बुध या शंकर भगवान की मूर्ति अथवा चित्र किसी कांस्य पात्र में स्थापित करें। तत्पश्चात धूप, बेल-पत्र, अक्षत और घी का दीपक जलाकर पूजा करें। इसके बाद निम्न मंत्र से बुध की प्रार्थना करें-
बुध त्वं बुद्धिजनको बोधद: सर्वदा नृणाम्।
तत्वावबोधं कुरुषे सोमपुत्र नमो नम:॥

बुधवार की व्रतकथा सुनकर आरती करें। इसके पश्चात गुड़, भात और दही का प्रसाद बाँटकर स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करें।

बुधवार व्रत के दिन क्या करें
इस दिन भगवान को सफेद फूल तथा हरे रंग की वस्तुएँ चढ़ाएँ। यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दान दें। व्रती एक समय ही भोजन करे। किसी भी रूप में व्रतकथा को बीच में छोड़कर, प्रसाद ग्रहण किए बिना कहीं नहीं जाना चाहिए।

बुधवार व्रतफल
बुधवार का नियमित व्रत करने से सर्व-सुखों की प्राप्ति होती है। जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता। इससे अरिष्ट ग्रहों की शांति होती है। इस व्रत के करने से बुद्धि बढ़ती है।

बुधवार व्रतकथा
समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत धनवान था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदर और गुणवंती लड़की संगीता से हुआ था। एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया।
मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा। माता-पिता बोले- ‘बेटा, आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते।´ लेकिन मधुसूदन नहीं माना। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को नहीं मानने की बात कही। बहुत आग्रह करने पर संगीता के माता-पिता ने विवश होकर दोनों को विदा कर दिया।
दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की। दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया। वहाँ से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की। रास्ते में संगीता को प्यास लगी। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया।
थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था। संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई। वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई।
मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा- ‘तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?´ मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूँ। लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?´
मधुसूदन ने लगभग चीखते हुए कहा- ‘तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।´ इस पर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो। संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था। मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है। अब तुम चुपचाप यहाँ से चलते बनो। नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूँगा।´
दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहाँ एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहाँ आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी।
राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा। राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई- ‘मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।´
मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि ‘हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूँगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूँगा।´
मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए। भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया।
कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे।
भगवान बुधदेव की अनुकम्पा से उनके घर में धन-संपत्ति की वर्षा होने लगी। जल्दी ही उनके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ भर गईं। बुधवार का व्रत करने से स्त्री-पुरुषों के जीवन में सभी मंगलकामनाएँ पूरी होती हैं। और व्रत करने वाले को बुधवार के दिन किसी आवश्यक काम से यात्रा करने पर कोई कष्ट भी नहीं होता है।

बुधवार व्रत की आरती
आरती युगलकिशोर की कीजै। तन मन धन न्योछावर कीजै॥
गौरश्याम मुख निरखन लीजै। हरि का रूप नयन भरि पीजै॥
रवि शशि कोटि बदन की शोभा। ताहि निरखि मेरो मन लोभा॥
ओढ़े नील पीत पट सारी। कुंजबिहारी गिरिवरधारी॥
फूलन सेज फूल की माला। रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला॥
कंचन थार कपूर की बाती। हरि आए निर्मल भई छाती॥
श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी। आरती करें सकल नर नारी॥
नंदनंदन बृजभान किशोरी। परमानंद स्वामी अविचल जोरी॥





॥ मंगलवार व्रत की आरती ॥

8 04 2007

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥
जाके बल से गिरवर काँपे। रोग दोष जाके निकट न झाँके॥
अंजनीपुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥
दे बीड़ा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥
लंक सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥
लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सँवारे॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। लाय संजीवन प्राण उबारे॥
पैठि पताल तोरि जम कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥
बाएँ भुजा असुर संहारे। दाहिने भुजा संत जन तारे॥
सुर नर मुनि आरती उतारें। जै जै जै हनुमान उचारें॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥
जो हनुमानजी की आरती गावै। बसि बैकुंठ परमपद पावै॥





॥ मंगलवार व्रतकथा ॥

8 04 2007

ऋषिनगर में केशवदत्त ब्राह्मण अपनी पत्नी अंजलि के साथ रहता था। केशवदत्त के घर में धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी। नगर में सभी केशवदत्त का सम्मान करते थे, लेकिन केशवदत्त संतान नहीं होने से बहुत चिंतित रहता था। दोनों पति-पत्नी प्रति मंगलवार को मंदिर में जाकर हनुमानजी की पूजा करते थे। विधिवत मंगलवार का व्रत करते हुए कई वर्ष बीत गए। ब्राह्मण बहुत निराश हो गया, लेकिन उसने व्रत करना नहीं छोड़ा।

कुछ दिनों के बाद केशवदत्त हनुमानजी की पूजा करने के लिए जंगल में चला गया। उसकी पत्नी अंजलि घर में रहकर मंगलवार का व्रत करने लगी। दोनों पति-पत्नी पुत्र-प्राप्ति के लिए मंगलवार का विधिवत व्रत करने लगे। कुछ दिनों बाद अंजलि ने अगले मंगलवार को व्रत किया लेकिन किसी कारणवश उस दिन अंजलि हनुमानजी को भोग नहीं लगा सकी और उस दिन वह सूर्यास्त के बाद भूखी ही सो गई।

अगले मंगलवार को हनुमानजी को भोग लगाए बिना उसने भोजन नहीं करने का प्रण कर लिया। छ: दिन तक अंजलि भूखी-प्यासी रही। सातवें दिन मंगलवार को अंजलि ने हनुमानजी की पूजा की, लेकिन तभी भूख-प्यास के कारण अंजलि बेहोश हो गई। हनुमानजी ने उसे स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा- ‘उठो पुत्री! मैं तुम्हारी पूजा-पाठ से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें सुंदर और सुयोग्य पुत्र होने का वर देता हूँ।’ यह कहकर हनुमानजी अंतर्धान हो गए। तत्काल अंजलि ने उठकर हनुमानजी को भोग लगाया और स्वयं भोजन किया।

हनुमानजी की अनुकम्पा से अंजलि ने एक सुंदर शिशु को जन्म दिया। मंगलवार को जन्म लेने के कारण उस बच्चे का नाम मंगलप्रसाद रखा गया। कुछ दिनों बाद अंजलि का पति केशवदत्त भी घर लौट आया। उसने मंगल को देखा तो अंजलि से पूछा- ‘यह सुंदर बच्चा किसका है?’ अंजलि ने खुश होते हुए हनुमानजी के दर्शन देने और पुत्र प्राप्त होने का वरदान देने की सारी कथा सुना दी। लेकिन केशवदत्त को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसके मन में पता नहीं कैसे यह कलुषित विचार आ गया कि अंजलि ने उसके साथ विश्वासघात किया है। अपने पापों को छिपाने के लिए अंजलि झूठ बोल रही है।

केशवदत्त ने उस बच्चे को मार डालने की योजना बनाई। एक दिन केशवदत स्नान के लिए कुएँ पर गया। मंगल भी उसके साथ था। केशवदत्त ने मौका देखकर मंगल को कुएँ में फेंक दिया और घर आकर बहाना बना दिया कि मंगल तो कुएँ पर मेरे पास पहुँचा ही नहीं। केशवदत्त के इतने कहने के ठीक बाद मंगल दौड़ता हुआ घर लौट आया।

केशवदत्त मंगल को देखकर बुरी तरह हैरान हो उठा। उसी रात हनुमानजी ने केशवदत्त को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा- ‘तुम दोनों के मंगलवार के व्रत करने से प्रसन्न होकर, पुत्रजन्म का वर मैंने दिया था। फिर तुम अपनी पत्नी को कुलटा क्यों समझते हो!’ उसी समय केशवदत्त ने अंजलि को जगाकर उससे क्षमा माँगते हुए स्वप्न में हनुमानजी के दर्शन देने की सारी कहानी सुनाई। केशवदत्त ने अपने बेटे को हृदय से लगाकर बहुत प्यार किया। उस दिन के बाद सभी आनंदपूर्वक रहने लगे।

मंगलवार का विधिवत व्रत करने से केशवदत्त और उनके सभी कष्ट दूर हो गए। इस तरह जो स्त्री-पुरुष विधिवत मंगलवार का व्रत करके व्रतकथा सुनते हैं, हनुमानजी उनके सभी कष्ट दूर करके घर में धन-संपत्ति का भंडार भर देते हैं। शरीर के सभी रक्त विकार के रोग भी नष्ट हो जाते हैं।





॥ मंगलवार व्रत ॥

8 04 2007

भगवान मंगल और पवनसुत हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए यह व्रत किया जाता है। मंगलवार का व्रत 21 सप्ताह तक किया जाता है। इसके नियमित करने से मंगल ग्रह की कुदृष्टि से सुरक्षा होती है।
मंगलवार व्रत विधि
मंगलवार को सूर्योदय से पूर्व सोकर उठें।
घर की सफाई कर स्वयं स्नानादि से निवृत्त हो जाएँ।
गंगाजल या किसी बावड़ी या कुएँ के पवित्र जल का घर में छिड़काव करें।
इसके बाद व्रती को लाल वस्त्र धारण करना चाहिए।
तत्पश्चात घर के ही किसी पवित्र स्थान पर भगवान मंगल या हनुमानजी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
पूजन स्थान पर चार बत्तियों का दीपक जलाएँ।
इसके बाद लाल गंध, पुष्प, अक्षत आदि से विधिवत हनुमानजी की पूजा-अर्चना करनी
चाहिए।

निम्न मंत्र से अघर्य दें-
भूमिपुत्रो महातेजा: कुमारो रक्तवस्त्रक:।
गृहाणाघर्यं मया दत्तमृणशांतिं प्रयच्छ हे।

तत्पश्चात आरती कर प्रसाद वितरित करें।
अंत में व्रतकथा सुनकर स्वयं प्रसाद ग्रहण करें।

व्रत लाभ
मंगलवार का व्रत मनुष्य को सुख-समृद्धि, राजकीय पद, सम्मान और पुत्र-प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है।
इस व्रत के विधिवत करने और कथा सुनने से मंगल कामनाएँ पूरी होती हैं।
मनुष्य को रक्त विकारों के रोग से मुक्ति मिलती है।
इस व्रत के करने से मनुष्य सभी दोषों से मुक्त हो जाता है।

मंगलवार के दिन क्या करें
व्रत करने वाले स्त्री-पुरुष को दिन में एक बार ही भोजन करना चाहिए।
भोजन में गेहूँ के आटे और गुड़ से बने खाद्य पदार्थ लेने चाहिए।
पूजा के बाद व्रत करने वाले को मंगलवार की व्रतकथा अवश्य सुननी चाहिए।
भूत-प्रेतादि बाधाग्रस्त व्यक्तियों को मंगलवार का व्रत अवश्य करना चाहिए।