वृहस्पतिवार की अन्य कथा

21 04 2007

देवराज इंद्र को स्वर्गलोक के सिंहासन पर बैठने का गर्व बहुत आनंदित कर रहा था। एक दिन सिंहासन पर बैठे हुए देवराज इंद्र जब अपने अहंकार में डूबे थे, तभी देवों के गुरु वृहस्पतिदेव वहाँ पहुँचे। वृहस्पतिदेव को देखकर सभी देवता उनके सम्मान में उठकर प्रणाम करने लगे लेकिन देवराज इंद्र सिंहासन के अहंकार में डूबे रहे। वृहस्पतिदेव ने इंद्र के इस व्यवहार को अपना अपमान समझा और तुरंत वहाँ से बाहर चले गए।

वृहस्पतिदेव के लौट जाने पर दूसरे देवताओं ने देवराज इंद्र से कहा कि आपको इस तरह वृहस्पतिदेव का अनादर करके उन्हें यूँ क्रोधित नहीं करना चाहिए था। वृहस्पतिदेव के क्रोधित होने से हम सबको बहुत हानि हो सकती है।

देवताओं के कथन पर देवराज इंद्र को अपनी भूल पर पश्चाताप होने लगा। मन ही मन वे सोचने लगे- ‘स्वर्ग का सिंहासन उन्हें गुरु वृहस्पतिदेव के कारण ही मिला है। उनके क्रोधित होने से उनका सारा वैभव नष्ट हो जाएगा। यह सोच देवराज इंद्र कुछ देवताओं के साथ वृहस्पतिदेव के निवास स्थल पर पहुँचे। लेकिन उनके पहुँचने से पूर्व वृहस्पतिदेव अपनी ज्योतिष विद्या से उनके आगमन की बात जानकर अदृश्य हो गए।

इंद्र वृहस्पतिदेव को वहाँ न पाकर बहुत निराश हुए। उधर असुरों के राजा वृषराज को वृहस्पतिदेव के क्रोधित होकर कहीं चले जाने का पता चला तो तुरंत अपनी सेना लेकर उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया। गुरु शुक्राचार्य की बुद्धिमानी से असुरों ने देवताओं को मारना शुरू कर दिया। वृहस्पतिदेव के साथ न होने से देवताओं की हार होने लगी।

देवराज इंद्र को स्वर्गलोक के सिंहासन पर वृषराज का अधिकार होता दिखाई देने लगा। तब देवराज इंद्र ने ब्रह्माजी के पास जाकर प्रार्थना की- ‘हे महाराज! हमें असुरों से बचाओ।’ ब्रह्माजी ने इंद्र से कहा- ‘इंद्र! तुमने गुरु वृहस्पतिदेव को क्रोधित करके अपनी पराजय को स्वयं आमंत्रित किया है। जब तक वृहस्पतिदेव न लौटें, तब तक तुम्हें त्वष्टा ब्राह्मण के विद्वान पुत्र विश्वनाथ को अपना गुरु बनाकर असुरों से युद्ध करना होगा। उसी स्थिति में तुम्हारा कल्याण हो सकता है।’

अपने रथ पर सवार होकर आकाश मार्ग से देवराज इंद्र विश्वनाथ के पास पहुँचे और उनसे गुरु बनने की प्रार्थना की। विश्वनाथ ने कहा- ‘देवराज! मैं अपने पिता की आज्ञा के बिना तुम्हारा गुरु नहीं बन सकता।’ देवराज ने तब त्वष्टा ब्राह्मण के पास पहुँचकर विश्वनाथ को गुरु पद स्वीकार कर लेने के लिए आज्ञा देने की प्रार्थना की।

त्वष्टा ने देवताओं की निश्चित पराजय जानकर अपने पुत्र विश्वनाथ को देवताओं का गुरु बनने की आज्ञा दे दी। विश्वनाथ के गुरु बन जाने से देवताओं की विजय हुई और वृषराज की पराजय।

विश्वनाथ के तीन मुँह थे। वे एक मुँह से भोजन करते थे, दूसरे से मदिरापान और तीसरे मुँह से सोमलता का रस पीते थे। कुछ दिनों के बाद देवराज इंद्र ने गुरु विश्वनाथ की आज्ञा से महायज्ञ प्रारंभ किया। उस महायज्ञ से देवराज इंद्र को असीम शक्ति मिलने वाली थी। विश्वनाथ ने यज्ञ प्रारंभ किया।

एक दिन एक असुरों ने एकांत पाकर विश्वनाथ से कहा- ‘गुरुराज! आपके पिता विद्वान ब्राह्मण अवश्य हैं, लेकिन आपकी माता असुर की कन्या हैं। इसलिए आपको यज्ञ करते समय एक आहुति असुरों के कल्याण के लिए भी देनी चाहिए।’ अब विश्वनाथ प्रतिदिन यज्ञ में असुरों के नाम से भी धीमे स्वर में आहुति देने लगे।

महायज्ञ से देवताओं को शक्ति नहीं मिली तो देवराज इंद्र ने वास्तविकता का पता लगाया। जब उन्हें पता चला कि विश्वनाथ असुरों के नाम की भी आहुति देते रहे हैं तो उन्होंने क्रोधित होकर विश्वनाथ के तीनों सिर काट डाले। तभी एक चमत्कार हुआ।

विश्वनाथ का मदिरापान करने वाला सिर भँवरा बना। भोजन करने वाला मुँह तीतर और सोमलता का रसपान करने वाला मुँह कबूतर बन गया। विश्वनाथ की मृत्यु होने से ब्रह्महत्या के प्रकोप से इंद्र का स्वरूप बदल गया। सभी देवता एक वर्ष तक प्रायश्चित करते रहे, लेकिन इंद्र का स्वरूप नहीं बदला।

तब सभी देवता मिलकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी को साथ लेकर देवता वृहस्पतिदेव के घर गए और उस ब्रह्महत्या के चार भाग किए। ब्रह्महत्या का एक भाग पृथ्वी को दिया। उस भाग के कारण पृथ्वी कहीं ऊँची, कहीं नीची हो गई। पृथ्वी कहीं भी समतल नहीं रही। ब्रह्माजी ने पृथ्वी को एक वरदान दिया। पृथ्वी पर कहीं भी कोई गड्ढा होगा तो वह कुछ समय बाद स्वयं भर जाएगा।

ब्रह्माजी ने ब्रह्महत्या का दूसरा भाग वृक्षों को देते हुए कहा कि इस भाग के कारण वृक्षों से गोंद बहा करेगा। गोंद तो सभी वृक्षों से निकलता है, लेकिन गुगल वृक्ष का गोंद सर्वोत्तम माना जाता है। वृक्षों को ब्रह्माजी ने यह वरदान भी दिया कि एक बार सूख जाने पर अपनी जड़ों के कारण वे दोबारा हरे-भरे हो सकते हैं।

तीसरा भाग स्त्रियों को दिया गया। उस भाग के कारण स्त्रियाँ हर महीने ऋतुस्त्राव से पीड़ित होती हैं। ऋतुस्त्राव चार दिन चलता है। इस ऋतुस्त्राव के कारण स्त्रियाँ पहले दिन चांडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन धोबिन के समान रहती हैं। चौथे दिन स्नान करने के बाद स्त्रियाँ ऋतुस्त्राव से शुद्ध होती हैं।

ब्रह्महत्या का चौथा भाग जल को दिया गया। उस भाग के कारण फेन और शैवाल स्वयं जल के ऊपर आकर तैरने लगते हैं। जल को किसी भी चीज में डालकर उसमें मिश्रित होने का वरदान मिला। इस तरह ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया।

वृहस्पतिवार की यह कथा सुनने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। वृहस्पतिवार कथा सुनने व सुनाने वाले के सभी कृष्ट दूर होते हैं। इस कथा के सुनने से विद्यालाभ होता है तथा मनुष्य विद्वान बनता है।


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