योग-5 || 4-प्राणायाम

21 04 2007

महर्षि पतंजलि ने कहा है, ‘श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायम’ यानी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। पतंजलि योग सूत्र के अनुसार योगी प्राणायाम के द्वारा आत्मा के प्रकाश में बाधक अविद्या को हटाता है। शरीर, मन तथा प्राण को शुद्ध करने के लिए प्राणायाम बहुत अच्छा साधन है। इसके निरंतर अभ्यास से अंतर्चेतना जागृत होती है। स्नायुमंडल की शुद्धि होती है। शरीर का कोई भी रोग ऐसा नहीं, जो प्राणायाम के अभ्यास से ठीक न किया जा सके।

प्राणायाम स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर अग्रसर होने का प्रवेश द्वार है। यह तो हम सभी जानते हैं कि हम श्वास लेते हैं और वायु में मिली हुई ऑक्सीजन , जिसकी शरीर को बहुत आवश्यकता होती है, ग्रहण करते हैं तथा उससे जीवनी शक्ति प्राप्त करते रहते हैं। यह क्रिया सोते-जागते निरंतर चलती रहती है।

वैसे तो सभी प्राणी जाने-अनजाने प्राणायाम करते रहते हैं। प्राणायाम में मुख्य रूप से तीन ही क्रियाएं होती हैं। 1. श्वास लेना 2. श्वास छोड़ना 3. उसे कुछ क्षण अंदर तथा बाहर रोकना।

इसी क्रिया को विधि अनुसार ध्यान तथा लगन से भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता है, तो प्राणायाम कहलाता है। इससे शक्ति संपन्नता प्राप्त होती है।

हमारे शरीर में 72 हजार नस-नाड़िया हैं, जिनमें 10 विशेष हैं और उनमें भी तीन विशेषतम हैं। वास्तव में ये तीन नाड़ियां न होकर ‘स्नायुमंडल’ ही हैं। ऐसा विज्ञान भी मानता है। ये तीन हैं-

इड़ा या चन्द्र नाड़ी : यह शरीर के बाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह ठंडी है तथा मानव के विचारों का नियंत्रण करती है।

पिंगला या सूर्य नाड़ी : यह शरीर के दाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह गर्म है तथा व्यक्ति में प्राण शक्ति का नियंत्रण करती है।

सुषुम्ना : यह मध्य नाड़ी है। मेरुदंड के मध्य में से होकर मूलाधार तक जाती है। न गर्म न ठंडी, परंतु दोनों के संतुलन में सहायक है। यह प्रकाश तथा ज्ञान देती है।

प्राणायाम का उद्देश्य इड़ा तथा पिंगला में ठीक संतुलन स्थापित करके सुषुम्ना के द्वारा प्रकाश तथा ज्ञान प्राप्त कराने में सहायता देना होता है। शारीरिक दृष्टि से इन तीनों नाड़ियों में ठीक-ठीक संतुलन, आरोग्य, बल-शांति तथा लंबी आयु प्रदान करने की क्षमता रहती है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाएं इड़ा, पिंगला या सुषुम्ना से किसी न किसी रूप में संबंधित हैं। इनमें ही श्वास-प्रश्वास के द्वारा वायु के परिभ्रमण से रक्त का संचार होता है। प्राय: श्वास प्रक्रिया के अंगों की दुर्बलता के कारण यह क्रिया उचित ढंग से नहीं हो पाती। फलत: अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

प्राणायाम से न केवल इन अंगों की दुर्बलता दूर होती है, बल्कि उनमें शक्ति-संपन्नता बढ़ती है, जिसके कारण योगी अपने प्राणों तथा स्नायुमंडल पर नियंत्रण पाकर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है।

लाभ : प्राणायाम का अभ्यास करने से फेफड़े मजबूत होते हैं, उनका लचीलापन बढ़ता है, अधिक से अधिक ऑक्सीजन शरीर को मिलती है तथा उसका उपयोग शरीर के विकार को बाहर निकालने में होता है।

प्राणायाम से मस्तिष्क के अंदर के स्नायुमंडल पर भी प्रभाव पड़ता है, मस्तिष्क से विकार दूर होते हैं। द्वंद्वों को सहन करने की शक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास पैदा होता है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है तथा मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है।

शरीर के अन्य अंग आंख, कान, जीभ, गला आदि पर भी प्राणायाम का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। प्राणायाम करने से आमाशय, लीवर, क्लामग्रंथि, गुर्दे तथा आंत स्वस्थ रहते हैं। इन अंगों में भी शुद्ध रक्त के परिभ्रमण की गति तेज होती है, जिससे विकार दूर होता है और कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

प्राणायाम का मन से भी घनिष्ठ संबंध है। प्राण पर नियंत्रण होने से मन पर सहज ही संतुलन प्राप्त हो जाता है। प्राणायाम एक प्रकार से श्वसन क्रियाओं का व्यायाम है, इसलिए इसे प्रात: काल शुद्ध व स्वच्छ वायु में खुले में करना चाहिए।


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2 responses

6 05 2007
Shrish

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7 05 2007
Jitu

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