अध्याय-1

21 04 2007

नेपाली, मराठी और अन्य कई भारतीय उपभाषाओं की तरह हिन्दी भी देवनागरी लिपी में लिखी जाती है जो संस्कृत के लिए भी सर्व स्वीकार्य लिपी है। हाल ही में लेखन में एकरूपता लाने के लिए और अक्षरों की शक्ल सुधारने के लिए इस लिपी का Central Hindi Directorate, Ministry of Education and Youth Services के द्वारा मानकीकरण हुआ था। इस लिपी में 11 स्वर और 35 व्यंजन हैं।
स्वरः अ a, आ aa, इ i, ई ee, उ u, ऊ oo, ऋ r, ए e, ऐ ai, ओ o, औ au

नोटः अनुस्वर (ं) और विसर्ग (ः) को अक्सर अं और अः की तरह लिखा जाता है वे स्वरों की सूची में शामिल किए जाते हैं। लेकिन वे वास्तव में व्यंजन हैं। स्वर ऋ बहुत सारे संस्कृत से उधार लिए गए शब्दों में उपयोग होता है।

व्यंजनः
क ka, ख kha, ग ga, घ gha, ङ na,
च ca, छ cha, ज ja, झ jha, ञ na,
ट ta, ठ tha, ड da, ढ dha, ण na,
त ta, थ tha, द da, ध dha, न na,
प pa, फ pha, ब ba, भ bha, म ma,
य ya, र ra, ल la, व va,
श sa, ष sa, स sa, ह ha, ड़ ra, ढ़ rha

नोटः सभी व्यंजनों में ‍’a’ अंतर्निहित होता है। ष केवल संस्कृत से उधार लिए गए शब्दों में प्रयोग होता है। ङ, ण, ञ, ड़, ढ़ से कोई भी शब्द शुरू नहीं होता। ङ और ञ कभी अकेले प्रयोग नहीं होते, उनके बाद हमेशा एक व्यंजन होता है। व्यंजनों के ऊपर कभी कभी चंद्रबिंदु (ँ, जैसे अँ, आँ आदि) का प्रयोग होता है। ये व्यंजन को अनुनासिक बनाता है। यानि वह व्यंजन नाक के द्वारा बोला जाता है। फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी से उधार लिए गए शब्दों के लिए व्यंजनों के पैर में बिंदु लगाया जाता है, जैसे क़, ख़, ग़, ज़, फ़। ॉ (ऑ) अंग्रेज़ी के शब्दों को दर्शाता है जैसे ऑफिस, कॉलेज।


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