योग-5 || 4-प्राणायाम

21 04 2007

महर्षि पतंजलि ने कहा है, ‘श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायम’ यानी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। पतंजलि योग सूत्र के अनुसार योगी प्राणायाम के द्वारा आत्मा के प्रकाश में बाधक अविद्या को हटाता है। शरीर, मन तथा प्राण को शुद्ध करने के लिए प्राणायाम बहुत अच्छा साधन है। इसके निरंतर अभ्यास से अंतर्चेतना जागृत होती है। स्नायुमंडल की शुद्धि होती है। शरीर का कोई भी रोग ऐसा नहीं, जो प्राणायाम के अभ्यास से ठीक न किया जा सके।

प्राणायाम स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर अग्रसर होने का प्रवेश द्वार है। यह तो हम सभी जानते हैं कि हम श्वास लेते हैं और वायु में मिली हुई ऑक्सीजन , जिसकी शरीर को बहुत आवश्यकता होती है, ग्रहण करते हैं तथा उससे जीवनी शक्ति प्राप्त करते रहते हैं। यह क्रिया सोते-जागते निरंतर चलती रहती है।

वैसे तो सभी प्राणी जाने-अनजाने प्राणायाम करते रहते हैं। प्राणायाम में मुख्य रूप से तीन ही क्रियाएं होती हैं। 1. श्वास लेना 2. श्वास छोड़ना 3. उसे कुछ क्षण अंदर तथा बाहर रोकना।

इसी क्रिया को विधि अनुसार ध्यान तथा लगन से भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता है, तो प्राणायाम कहलाता है। इससे शक्ति संपन्नता प्राप्त होती है।

हमारे शरीर में 72 हजार नस-नाड़िया हैं, जिनमें 10 विशेष हैं और उनमें भी तीन विशेषतम हैं। वास्तव में ये तीन नाड़ियां न होकर ‘स्नायुमंडल’ ही हैं। ऐसा विज्ञान भी मानता है। ये तीन हैं-

इड़ा या चन्द्र नाड़ी : यह शरीर के बाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह ठंडी है तथा मानव के विचारों का नियंत्रण करती है।

पिंगला या सूर्य नाड़ी : यह शरीर के दाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह गर्म है तथा व्यक्ति में प्राण शक्ति का नियंत्रण करती है।

सुषुम्ना : यह मध्य नाड़ी है। मेरुदंड के मध्य में से होकर मूलाधार तक जाती है। न गर्म न ठंडी, परंतु दोनों के संतुलन में सहायक है। यह प्रकाश तथा ज्ञान देती है।

प्राणायाम का उद्देश्य इड़ा तथा पिंगला में ठीक संतुलन स्थापित करके सुषुम्ना के द्वारा प्रकाश तथा ज्ञान प्राप्त कराने में सहायता देना होता है। शारीरिक दृष्टि से इन तीनों नाड़ियों में ठीक-ठीक संतुलन, आरोग्य, बल-शांति तथा लंबी आयु प्रदान करने की क्षमता रहती है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाएं इड़ा, पिंगला या सुषुम्ना से किसी न किसी रूप में संबंधित हैं। इनमें ही श्वास-प्रश्वास के द्वारा वायु के परिभ्रमण से रक्त का संचार होता है। प्राय: श्वास प्रक्रिया के अंगों की दुर्बलता के कारण यह क्रिया उचित ढंग से नहीं हो पाती। फलत: अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

प्राणायाम से न केवल इन अंगों की दुर्बलता दूर होती है, बल्कि उनमें शक्ति-संपन्नता बढ़ती है, जिसके कारण योगी अपने प्राणों तथा स्नायुमंडल पर नियंत्रण पाकर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है।

लाभ : प्राणायाम का अभ्यास करने से फेफड़े मजबूत होते हैं, उनका लचीलापन बढ़ता है, अधिक से अधिक ऑक्सीजन शरीर को मिलती है तथा उसका उपयोग शरीर के विकार को बाहर निकालने में होता है।

प्राणायाम से मस्तिष्क के अंदर के स्नायुमंडल पर भी प्रभाव पड़ता है, मस्तिष्क से विकार दूर होते हैं। द्वंद्वों को सहन करने की शक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास पैदा होता है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है तथा मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है।

शरीर के अन्य अंग आंख, कान, जीभ, गला आदि पर भी प्राणायाम का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। प्राणायाम करने से आमाशय, लीवर, क्लामग्रंथि, गुर्दे तथा आंत स्वस्थ रहते हैं। इन अंगों में भी शुद्ध रक्त के परिभ्रमण की गति तेज होती है, जिससे विकार दूर होता है और कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

प्राणायाम का मन से भी घनिष्ठ संबंध है। प्राण पर नियंत्रण होने से मन पर सहज ही संतुलन प्राप्त हो जाता है। प्राणायाम एक प्रकार से श्वसन क्रियाओं का व्यायाम है, इसलिए इसे प्रात: काल शुद्ध व स्वच्छ वायु में खुले में करना चाहिए।





वृहस्पतिवार व्रत की आरती

21 04 2007

जय जय आरती राम तुम्हारी। राम दयालु भक्त हितकारी॥
जनहित प्रगटे हरि व्रतधारी। जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पारी॥
द्रुपदसुता को चीर बढ़ायो। गज के काज पयादे धायो॥
दस सिर छेदि बीस भुज तोरे। तैंतीसकोटि देव बंदी छोरे॥
छत्र लिए सर लक्ष्मण भ्राता। आरती करत कौशल्या माता॥
शुक शारद नारदमुनि ध्यावैं। भरत शत्रुघन चँवर ढुरावैं॥
राम के चरण गहे महावीरा। ध्रुव प्रहलाद बालिसुर वीरा॥
लंका जीति अवध हरि आए। सब संतन मिलि मंगल गाए॥
सीय सहित सिंहासन बैठे। रामा। सभी भक्तजन करें प्रणामा॥





वृहस्पतिवार की अन्य कथा

21 04 2007

देवराज इंद्र को स्वर्गलोक के सिंहासन पर बैठने का गर्व बहुत आनंदित कर रहा था। एक दिन सिंहासन पर बैठे हुए देवराज इंद्र जब अपने अहंकार में डूबे थे, तभी देवों के गुरु वृहस्पतिदेव वहाँ पहुँचे। वृहस्पतिदेव को देखकर सभी देवता उनके सम्मान में उठकर प्रणाम करने लगे लेकिन देवराज इंद्र सिंहासन के अहंकार में डूबे रहे। वृहस्पतिदेव ने इंद्र के इस व्यवहार को अपना अपमान समझा और तुरंत वहाँ से बाहर चले गए।

वृहस्पतिदेव के लौट जाने पर दूसरे देवताओं ने देवराज इंद्र से कहा कि आपको इस तरह वृहस्पतिदेव का अनादर करके उन्हें यूँ क्रोधित नहीं करना चाहिए था। वृहस्पतिदेव के क्रोधित होने से हम सबको बहुत हानि हो सकती है।

देवताओं के कथन पर देवराज इंद्र को अपनी भूल पर पश्चाताप होने लगा। मन ही मन वे सोचने लगे- ‘स्वर्ग का सिंहासन उन्हें गुरु वृहस्पतिदेव के कारण ही मिला है। उनके क्रोधित होने से उनका सारा वैभव नष्ट हो जाएगा। यह सोच देवराज इंद्र कुछ देवताओं के साथ वृहस्पतिदेव के निवास स्थल पर पहुँचे। लेकिन उनके पहुँचने से पूर्व वृहस्पतिदेव अपनी ज्योतिष विद्या से उनके आगमन की बात जानकर अदृश्य हो गए।

इंद्र वृहस्पतिदेव को वहाँ न पाकर बहुत निराश हुए। उधर असुरों के राजा वृषराज को वृहस्पतिदेव के क्रोधित होकर कहीं चले जाने का पता चला तो तुरंत अपनी सेना लेकर उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया। गुरु शुक्राचार्य की बुद्धिमानी से असुरों ने देवताओं को मारना शुरू कर दिया। वृहस्पतिदेव के साथ न होने से देवताओं की हार होने लगी।

देवराज इंद्र को स्वर्गलोक के सिंहासन पर वृषराज का अधिकार होता दिखाई देने लगा। तब देवराज इंद्र ने ब्रह्माजी के पास जाकर प्रार्थना की- ‘हे महाराज! हमें असुरों से बचाओ।’ ब्रह्माजी ने इंद्र से कहा- ‘इंद्र! तुमने गुरु वृहस्पतिदेव को क्रोधित करके अपनी पराजय को स्वयं आमंत्रित किया है। जब तक वृहस्पतिदेव न लौटें, तब तक तुम्हें त्वष्टा ब्राह्मण के विद्वान पुत्र विश्वनाथ को अपना गुरु बनाकर असुरों से युद्ध करना होगा। उसी स्थिति में तुम्हारा कल्याण हो सकता है।’

अपने रथ पर सवार होकर आकाश मार्ग से देवराज इंद्र विश्वनाथ के पास पहुँचे और उनसे गुरु बनने की प्रार्थना की। विश्वनाथ ने कहा- ‘देवराज! मैं अपने पिता की आज्ञा के बिना तुम्हारा गुरु नहीं बन सकता।’ देवराज ने तब त्वष्टा ब्राह्मण के पास पहुँचकर विश्वनाथ को गुरु पद स्वीकार कर लेने के लिए आज्ञा देने की प्रार्थना की।

त्वष्टा ने देवताओं की निश्चित पराजय जानकर अपने पुत्र विश्वनाथ को देवताओं का गुरु बनने की आज्ञा दे दी। विश्वनाथ के गुरु बन जाने से देवताओं की विजय हुई और वृषराज की पराजय।

विश्वनाथ के तीन मुँह थे। वे एक मुँह से भोजन करते थे, दूसरे से मदिरापान और तीसरे मुँह से सोमलता का रस पीते थे। कुछ दिनों के बाद देवराज इंद्र ने गुरु विश्वनाथ की आज्ञा से महायज्ञ प्रारंभ किया। उस महायज्ञ से देवराज इंद्र को असीम शक्ति मिलने वाली थी। विश्वनाथ ने यज्ञ प्रारंभ किया।

एक दिन एक असुरों ने एकांत पाकर विश्वनाथ से कहा- ‘गुरुराज! आपके पिता विद्वान ब्राह्मण अवश्य हैं, लेकिन आपकी माता असुर की कन्या हैं। इसलिए आपको यज्ञ करते समय एक आहुति असुरों के कल्याण के लिए भी देनी चाहिए।’ अब विश्वनाथ प्रतिदिन यज्ञ में असुरों के नाम से भी धीमे स्वर में आहुति देने लगे।

महायज्ञ से देवताओं को शक्ति नहीं मिली तो देवराज इंद्र ने वास्तविकता का पता लगाया। जब उन्हें पता चला कि विश्वनाथ असुरों के नाम की भी आहुति देते रहे हैं तो उन्होंने क्रोधित होकर विश्वनाथ के तीनों सिर काट डाले। तभी एक चमत्कार हुआ।

विश्वनाथ का मदिरापान करने वाला सिर भँवरा बना। भोजन करने वाला मुँह तीतर और सोमलता का रसपान करने वाला मुँह कबूतर बन गया। विश्वनाथ की मृत्यु होने से ब्रह्महत्या के प्रकोप से इंद्र का स्वरूप बदल गया। सभी देवता एक वर्ष तक प्रायश्चित करते रहे, लेकिन इंद्र का स्वरूप नहीं बदला।

तब सभी देवता मिलकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी को साथ लेकर देवता वृहस्पतिदेव के घर गए और उस ब्रह्महत्या के चार भाग किए। ब्रह्महत्या का एक भाग पृथ्वी को दिया। उस भाग के कारण पृथ्वी कहीं ऊँची, कहीं नीची हो गई। पृथ्वी कहीं भी समतल नहीं रही। ब्रह्माजी ने पृथ्वी को एक वरदान दिया। पृथ्वी पर कहीं भी कोई गड्ढा होगा तो वह कुछ समय बाद स्वयं भर जाएगा।

ब्रह्माजी ने ब्रह्महत्या का दूसरा भाग वृक्षों को देते हुए कहा कि इस भाग के कारण वृक्षों से गोंद बहा करेगा। गोंद तो सभी वृक्षों से निकलता है, लेकिन गुगल वृक्ष का गोंद सर्वोत्तम माना जाता है। वृक्षों को ब्रह्माजी ने यह वरदान भी दिया कि एक बार सूख जाने पर अपनी जड़ों के कारण वे दोबारा हरे-भरे हो सकते हैं।

तीसरा भाग स्त्रियों को दिया गया। उस भाग के कारण स्त्रियाँ हर महीने ऋतुस्त्राव से पीड़ित होती हैं। ऋतुस्त्राव चार दिन चलता है। इस ऋतुस्त्राव के कारण स्त्रियाँ पहले दिन चांडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन धोबिन के समान रहती हैं। चौथे दिन स्नान करने के बाद स्त्रियाँ ऋतुस्त्राव से शुद्ध होती हैं।

ब्रह्महत्या का चौथा भाग जल को दिया गया। उस भाग के कारण फेन और शैवाल स्वयं जल के ऊपर आकर तैरने लगते हैं। जल को किसी भी चीज में डालकर उसमें मिश्रित होने का वरदान मिला। इस तरह ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया।

वृहस्पतिवार की यह कथा सुनने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। वृहस्पतिवार कथा सुनने व सुनाने वाले के सभी कृष्ट दूर होते हैं। इस कथा के सुनने से विद्यालाभ होता है तथा मनुष्य विद्वान बनता है।





वृहस्पतिवार व्रतकथा

21 04 2007

कुशीनगर में धनपतराय नाम का एक धनी व्यक्ति रहता था। उसके घर में कोई अभाव नहीं था। धनपतराय का व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था। धनपतराय की पत्नी मालती बहुत लोभी और ईष्या-द्वेष करने वाली थी। घर में भंडार भरे होने पर भी वह किसी निर्धन या भिक्षु को कुछ नहीं देती थी।

एक दिन एक संन्यासी धनपतराय के घर पर आया। उसने दरवाजे पर खड़े होकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई। धनपतराय की पत्नी मालती उस समय आँगन लीप रही थी। उसने कहा- ‘महाराज! इस समय तो मैं आँगन लीप रही हूँ। अत: आपको भिक्षा नहीं दे सकती।’ संन्यासी खाली हाथ लौट गया।

कुछ दिनों बाद भ्रमण करते हुए वही संन्यासी फिर धनपतराय के घर पहुँचा और दरवाजे पर खड़े होकर भिक्षा देने के लए आवाज लगाई। मालती आँगन में बैठी अपने बेटे को खाना खिला रही थी। उसने संन्यासी से कहा- ‘महाराज! मैं अपने बेटे को भोजन करा रही हूँ। इस समय आपको भिक्षा नहीं दे सकती। जब मुझे अवकाश हो जाए तो आप आना।’ संन्यासी फिर निराश होकर खाली हाथ लौट गया।

कुछ दिनों बाद संन्यासी फिर धनपतराय के घर पहुँचा और द्वार पर खड़े होकर भिक्षा देने के लिए पुकारा। मालती हाथ में झाडू लिए दरवाजे पर आकर बोली- ‘महाराज! घर में झाडू-बुहारी कर रही हूँ। उसके बाद बहुत से वस्त्र धोने हैं। आज तो मुझे बिलकुल फुर्सत नहीं। आज तो मैं आपको भिक्षा नहीं दे सकती। फिर कभी फुर्सत के समय आना।’

मालती के वचन सुनकर संन्यासी मन ही मन मुस्कराया और धीरे से बोला- ‘मैं तुम्हें ऐसा उपाय बता सकता हूँ जिससे तुम्हें अवकाश ही अवकाश हो जाएगा। भगवान की लीला से तुम्हारे सभी काम अपने आप पूरे हो जाया करेंगे और फिर तुम पूरा दिन आराम से बैठकर गुजार सकोगी।’

संन्यासी की बात सुनकर मालती ने खुश होते हुए कहा- ‘महाराज! यदि ऐसा हो जाए तो मैं आपको बहुत-सा धन, अन्न और वस्त्र दान कर दूँगी। आप जल्दी से मुझे वह उपाय बता दीजिए।’

संन्यासी ने मन ही मन मुस्कराते हुए धीरे से कहा- ‘तुम वृहस्पतिवार को खूब धूप निकलने पर बिस्तर से उठना। फिर घर में झाडू लगाकर सारा कूड़ा घर के एक कोने में एकत्र कर देना। उस दिन घर में कहीं लीपना नहीं। उस दिन परिवार के सभी पुरुष दाढ़ी अवश्य बनवाएँ। भोजन बनाकर तुम चूल्हे के पीछे रख देना। शाम को अँधेरा होने के बाद दीपक जलाना और वृहस्पतिवार को पीले वस्त्र बिलकुल न पहनना। उस दिन पीले रंग की कोई वस्तु या अन्न नहीं खाना। यदि तुम ऐसा करोगी तो तुम्हें कभी कोई काम नहीं करना पड़ेगा और फिर तुम्हें अवकाश ही अवकाश होगा।’

अगले वृहस्पतिवार को मालती ने अपने पति और घर के दूसरे पुरुषों को देर से उठाकर, स्नान करके दाढ़ी के बाल काटने के लिए कह दिया। स्वयं भी उस दिन खूब धूप निकल आने पर ही उठी। भोजन बनाकर उसने चूल्हे के पीछे रखा और घर में दूध की खीर बनाकर सबको पेटभर खिलाई।

कई मास तक मालती हर वृहस्पतिवार को ऐसा ही करती रही। अचानक उसके दुष्करर्मों से उसके पति को व्यवसाय में हानि हुई। घर में चोरी होने से वस्त्र-आभूषण और धन चला गया। नौकर-चाकर उन्हें छोड़कर चले गए। घर में अन्न का दाना तक नहीं रहा। लोगों से भिक्षा माँगकर पेट भरने की नौबत आ गई।

मालती अपने घर के बाहर उदास बैठी थी। उसका पति किसी संबंधी से धन उधार लेने गया था। उसी समय संन्यासी वहाँ पर आया। उसने भिक्षा पात्र आगे करते हुए कहा- ‘भगवान की अनुकम्पा से अब तुम्हें बहुत अवकाश होगा। इसलिए हे देवी, जल्दी से उठकर मुझे थोड़ी-सी भिक्षा दे दो।’

उसे देखते ही मालती संन्यासी के चरणों में गिरकर बोली- ‘महाराज! मुझे क्षमा करें। मैंने झूठ बोलकर आपको भिक्षा देने से इनकार किया था। मेरी गलती से मेरे घर की धन-संपत्ति, अन्न और वैभव सब नष्ट हो गया। महाराज! मुझे कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरा घर पहले की तरह अन्न, वस्त्र और धन, वैभव से भर जाए। यदि आपने कोई उपाय नहीं बताया तो मैं आपके चरणों में सिर पटक-पटककर अपने प्राण दे दूँगी।’

संन्यासी ने मन ही मन मुस्कराते हुए कहा- ‘हे देवी! मेरे चरण छोड़ो और मेरी बात ध्यान से सुनो। भगवान वृहस्पति ही तुम्हारा कल्याण कर सकते हैं इसलिए प्रत्येक वृहस्पतिवार को उनका व्रत करते हुए उनकी पूजा-अर्चना पीले पुष्पों से अवश्य करो। केले की पूजा करने से अनेक शुभ फल मिलते हैं। वृहस्पतिवार को घर में कोई पुरुष दाढ़ी व सिर के बाल न कटवाए। सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि करके, घर के आँगन को गोबर से लीपकर पूजा करे। शाम को घी का दीपक अवश्य जलाना। तुम विधिवत वृहस्पतिवार का व्रत करोगी तो तुम्हारे घर में धन-धान्य की वर्षा होगी। सभी कामनाएँ पूरी होंगी और सभी को विद्या का लाभ होगा।’

इतना कहते ही संन्यासी अंतर्धयान हो गए तो मालती आश्चर्यचकित रह गई। उसने प्रत्येक वृहस्पतिवार को विधिवत व्रत किया। वृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से उसके घर में धन-धान्य की वर्षा होने लगी। खोया हुआ मान-सम्मान और वैभव पुन: प्राप्त हो गया।

वृहस्पतिवार को जो भी स्त्री-पुरुष वृहस्पतिदेव की विधिवत पूजा करते हैं, उनके घर में सुख-संपत्ति का भंडार भरा रहता है और विद्या के लाभ से अज्ञानता नष्ट होती है। समाज में मान-सम्मान बढ़ता है।





॥ वृहस्पतिवार व्रत ॥

21 04 2007

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार के योग के दिन इस व्रत की शुरुआत करना चाहिए। इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। नियमित सात व्रत करने से गुरु ग्रह से उत्पन्न होने वाला अनिष्ट नष्ट होता है। कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्ध होकर मनोकामना पूर्ति के लिए बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए। पीले रंग के चंदन, अन्न, वस्त्र और फूलों का इस व्रत में विशेष महत्व होता है।

वृहस्पतिवार व्रत कैसे करें
सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। शुद्ध जल छिड़ककर पूरा घर पवित्र करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर वृहस्पति की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात पीत वर्ण के गंध-पुष्प और अक्षत से विधिविधान से पूजन करें। इसके बाद निम्न मंत्र से प्रार्थना करें-
धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग।
विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोस्तु ते॥

तत्पश्चात आरती कर व्रतकथा सुनें। अंत में प्रसाद वितरण कर पहले ब्राह्मण को भोजन कराएँ फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।

वृहस्पतिवार व्रत के दिन क्या करें
इस दिन एक समय ही भोजन किया जाता है। व्रत करने वाले को भोजन में चने की दाल अवश्य खानी चाहिए। वृहस्पतिवार के व्रत में कंदलीफल (केले) के वृक्ष की पूजा की जाती है।

वृहस्पतिवार व्रत के दिन क्या न करें
स्त्रियों को इस दिन कपड़े तथा सिर नहीं धोना चाहिए। स्त्रियों को इस दिन तेल, कंघी व चोटी भी नहीं करना चाहिए।

व्रत लाभ
वृहस्पतिवार व्रत के पूजन से स्त्री-पुरुष को वृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से धन-संपत्ति का अपार लाभ होता है। परिवार में सुख तथा शांति रहती है। स्त्रियों के लिए वृहस्पतिवार का व्रत बहुत शुभ फल देने वाला है। वृहस्पतिदेव की पूजा के पश्चात कथा सुनने का विशेष महत्व है। वृहस्पतिवार के व्रत करने और कथा सुनने से विद्या का बहुत लाभ होता है। वृहस्पतिवार का नियमित व्रत रखने वाली स्त्री की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।





अध्याय-1

21 04 2007

नेपाली, मराठी और अन्य कई भारतीय उपभाषाओं की तरह हिन्दी भी देवनागरी लिपी में लिखी जाती है जो संस्कृत के लिए भी सर्व स्वीकार्य लिपी है। हाल ही में लेखन में एकरूपता लाने के लिए और अक्षरों की शक्ल सुधारने के लिए इस लिपी का Central Hindi Directorate, Ministry of Education and Youth Services के द्वारा मानकीकरण हुआ था। इस लिपी में 11 स्वर और 35 व्यंजन हैं।
स्वरः अ a, आ aa, इ i, ई ee, उ u, ऊ oo, ऋ r, ए e, ऐ ai, ओ o, औ au

नोटः अनुस्वर (ं) और विसर्ग (ः) को अक्सर अं और अः की तरह लिखा जाता है वे स्वरों की सूची में शामिल किए जाते हैं। लेकिन वे वास्तव में व्यंजन हैं। स्वर ऋ बहुत सारे संस्कृत से उधार लिए गए शब्दों में उपयोग होता है।

व्यंजनः
क ka, ख kha, ग ga, घ gha, ङ na,
च ca, छ cha, ज ja, झ jha, ञ na,
ट ta, ठ tha, ड da, ढ dha, ण na,
त ta, थ tha, द da, ध dha, न na,
प pa, फ pha, ब ba, भ bha, म ma,
य ya, र ra, ल la, व va,
श sa, ष sa, स sa, ह ha, ड़ ra, ढ़ rha

नोटः सभी व्यंजनों में ‍’a’ अंतर्निहित होता है। ष केवल संस्कृत से उधार लिए गए शब्दों में प्रयोग होता है। ङ, ण, ञ, ड़, ढ़ से कोई भी शब्द शुरू नहीं होता। ङ और ञ कभी अकेले प्रयोग नहीं होते, उनके बाद हमेशा एक व्यंजन होता है। व्यंजनों के ऊपर कभी कभी चंद्रबिंदु (ँ, जैसे अँ, आँ आदि) का प्रयोग होता है। ये व्यंजन को अनुनासिक बनाता है। यानि वह व्यंजन नाक के द्वारा बोला जाता है। फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी से उधार लिए गए शब्दों के लिए व्यंजनों के पैर में बिंदु लगाया जाता है, जैसे क़, ख़, ग़, ज़, फ़। ॉ (ऑ) अंग्रेज़ी के शब्दों को दर्शाता है जैसे ऑफिस, कॉलेज।





योग-5 || 3-आसन

14 04 2007

आसन एक वैज्ञानिक पद्धति है। ये हमारे शरीर को स्वच्छ, शुद्ध व सक्रिय रखकर मनुष्य को शारीरिक व मानसिक रूप से सदा स्वस्थ्य रख सकते हैं। इनका लाभ प्रतिदिन अभ्यास करने से ही मिल सकता है।

केवल आसन ही एक ऐसा व्यायाम है, जो हमारे अंदर के शरीर पर प्रभाव डाल सकता है। शरीर और मन का स्वस्थ रहना हमारे शरीर के आंतरिक अंगों के ठीक प्रकार से कार्य करने पर निर्भर करता है।

अंदर के अंग हैं: हृदय, फेफड़े, पाचन संस्थान, बहुत सी ग्रंथियां, मूत्र संस्थान, मस्तिष्क नाड़ियां इत्यादि। स्वस्थ रखना शरीर का अपना काम है। प्रकृति ने शरीर में इस प्रकार की सारी व्यवस्था कर रखी है, जिससे उसे (शरीर को) स्वस्थ रखा जा सकता है और हर प्रकार के रोगों से बचाया जा सकता है।

नाड़ी सूत्रों तथा मस्तिष्क से ही पूरे शरीर का संचालन होता है। मस्तिष्क तथा नाड़ी संस्थान दोनों को स्वस्थ रखने के लिए योग के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।

योगियों ने ऐसे आसन, प्राणायाम आदि का वर्णन किया है, जिनके अभ्यास से शरीर एवं मन पर संयम रखा जा सकता है। स्थिरम् सुखमासनम (यो.सू.) शरीर स्थिर रहे तथा मन को सुख प्राप्त हो, इस प्रकार की स्थिति आसन है।

लौकिक कर्मो में शरीर को अधिक कसने का नाम प्रयत्न है। इस प्रयत्न में शरीर को अधिक न थकाना, प्रयास की शिथिलता यानी सामान्य निवृत्ति, शरीर को विश्राम की स्थिति में रखने और प्रभु का ध्यान करने से आसन की सिद्धि होती है। आसन की सिद्धि ने नाड़ियों की शुद्धि, आरोग्य की वृद्धि एवं स्फूर्ति प्राप्त होती है।

आसन दो प्रकार के होते हैं

1. प्राणायाम: ध्यान आदि के लिए, जैसे पद्मासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन।
2. शरीर तथा मन को निरोग रखने के लिए पश्चिमोत्तानासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, गोरक्षासन, जानुशिरासन, सुप्तवज्रासन, उष्ट्रासन, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, हलासन, मकरासन, पवनमुक्तासन, सवाøगासन, मत्स्यासन, शीर्षासन इत्यादि।

इनसे शारीरिक बल, यौवन, आंतरिक अवयव और अंतर्ग्रन्थियों की कार्यक्षमता बढ़ती है तथा शरीर का सर्वागीण विकास होता है। योगासन तथा मन को स्वस्थ व शांत रखकर आयु लंबी करने और आजीवित युवा रहने का लाभ अवश्य ले सकते हैं।





योग-4 || 2-नियम

14 04 2007

योग के आठ अंगों में नियम दूसरी पायदान है। योगासन के अन्य अंगों की तरह नियम भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
नियम का पालन व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है, ये भी पांच प्रकार के हैं- शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान।

यम दूसरों के साथ व्यवहार से संबंधित हैं और नियम निज के पालन के लिए हैं।

शौच : शरीर तथा मन की पवित्रता शौच है। पवित्रता दो प्रकार की होती है, बाह्म और आंतरिक। मिट्टी, उबटन, त्रिफला साबुन आदि लगाकर जल से स्नान करने से त्वचा एवं अंगों की शुद्धि होती है और काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार आदि को त्याग कर मन शुद्ध होता है सत्याचरण से।

ईर्षा, द्वेष, तृष्ण, अभियान, कुविचार व पंच क्लेशों को छोड़ने से तथा दया, क्षमा, नम्रता, स्नेह, मधुर भाषण तथा त्याग से आंतरिक पवित्रता आ जाती है।

संतोष : शरीर के पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त धन से अधिक की लालसा न करना। न्यूनाधिक की प्राप्ति पर शोक या हर्ष न करना संतोष है। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जो प्राप्त हो, उसी से संतुष्ट रहना या प्रभु की कृपा से जो मिल जाए, उसे ही प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना संतोष है। जब विचार पूर्वक अपने भाग्य पर विश्वास दृढ़ होगा, तभी संतोष होता है।

तप : सुख-दु:ख, सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि को सहन करते हुए मन तथा शरीर को साधना तप है। कुवृत्तियों का सदा निवारण करते रहना, मान, अपमान, हानि, निंदा से भी बुद्धि का संतुलन न खोना, हिंसा, असत्य, चोरी, व्यभिचार, परिग्रह आदि यम नियमों की विपरीत भावनाओं का दमन करना, विषयों में दौड़ने वाली इन्द्रियों और मन का दमन करते रहना तथा आसक्तियों से स्वयं को हटाए रखना तप है।

स्वाध्याय : अपनी रुचि तथा निष्ठा के अनुसार विचार शुद्धि और ज्ञान प्राप्त करने के लिए सामाजिक, वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक विषयों का नित्य नियम से पठन करना, मनन करना और सत्संग तथा विचारों का अदान-प्रदान करना स्वाध्याय कहलाता है।

ईश्वर प्रणिधान : बुद्धि, नम्रता, भक्ति विशेष तथा पूर्ण तन्मयता के साथ प्रत्येक कर्म को फल सहित, परमात्मा को निर्मल भाव से सानंद समिर्पत करना ईश्वर प्रणिधान कहलाता है।

कर्म किए बिना कोई प्राणी रह नहीं सकता। जो भी कर्म मैं कर रहा हूं, वह प्रभु के आदेशानुसार कर रहा हूं। इसमें कर्तापन में अभियान त्याग का भाव ही प्रबल रहता है।

इस प्रकार उपासक अपनी देह आदि से किए गए सभी कर्म तथा फलाफल प्रभु को सहर्ष अर्पित करता है। फलत: दंभ के कलुष से व्यक्ति का अंत:करण सर्वदा रहित हो जाता है। ये सब शुद्ध मन से ही संभव है।





योग-3 || 6-धारणा

14 04 2007

योग के आठ अंगों में धारणा छठा अंग है। धारणा यानी धारण करना, लेना, जीवन में लाना या ग्रहण करना आदि से संबंधित है।
योग का अर्थ है मिलाप। आत्मा के परमात्मा में मिलन को योग कहा जाता है।
अपने नियमित अभ्यास से योग की साधना करते समय व्यक्ति अंतर्मुखी हो जाता है। उसे सृष्टि परमात्मामय दिखने लगती है। समस्त मानव जाति, पशु, पक्षी, पेड़, पौधे आदि सब में परमात्मा दिखने लगते हैं।
स्वयं को स्वयं में स्थिर करने की साधना को धारणा कहते हैं। स्थूल व सूक्ष्म किसी भी विषय में अर्थात हृदय, भ्रुकुटि, नासिका, ॐ शब्द आदि आध्यात्मिक प्रदेश तथा इष्ट प्रदेश देवता की मूर्ति में चित्त को लगाना धारणा कहलाता है।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम आदि के उचित अभ्यास के पश्चात यह कार्य सरलता से होता है। प्राणायाम से प्राण वायु और प्रत्याहार से इन्द्रियों के वश में होने से चित्त में दुविधा नहीं रहती, जिससे शांत चित्त किसी एक लक्ष्य पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है।





योग-2 ||1. यम

14 04 2007

योग के आठ अंगों में से यम पहला है, यदि इन आठों में से किसी भी एक को छोड़ दिया जाए तो योगासन अधूरा माना जाता है-
यम पांच हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
अहिंसा: अहिंसा का अर्थ है, कभी भी किसी प्राणी का अपकार न करना, कष्ट न देना। अहिंसा व हिंसा का मुख्य स्त्रोत बुद्धि है। बुद्धि ही भले-बुरे का निर्णय करके वचन तथा कर्म में मन को तैयार करती है। अत: मन, वचन तथा कर्म में हिंसा को पूरी तरह छोड़ देना ही पूर्ण अहिंसा है।
आत्मवत् सर्वभूतेषु (सबको अपने जैसा समझना) ऐसा साक्षात्कार हो जाने पर ही योगी पूर्ण अहिंसक बनता है। ऐसी अनुभूति से जब जीवन रंग जाता है, तब किसी प्राणी के द्वारा कष्ट, अपमान व हानि पाकर भी बुद्धि में उत्तेजना नहीं होती, तभी व्यक्ति को अहिंसावादी कहा जा सकता है।
सत्य: जो व्यक्ति मन, वचन कर्म से समान रहे, अर्थात् एक जैसी वाणी और मन का व्यवहार करना, जैसा देखा और अनुमान लगाकर बुद्धि से निर्णय किया अथवा जैसा सुना वैसा ही वाणी से कह दिया और मन में धारण किया।
अपने ज्ञान के अनुसार, दूसरे व्यक्ति को ज्ञान करवाने में कहा हुआ वचन यदि धोखा देने वाला या भ्रम में डालने वाला न होकर ज्ञान करवाने वाला हो, तभी सत्य होता है। यह वचन उपकारी भी होना चाहिए। सब प्रकार से परीक्षा करके सर्वभूत हितकारी वचन बोलना ही सत्य है।
अस्तेय: दूसरों के पदार्थों की ओर ध्यान न देना, उन्हें चुराने का विचार मन में न लाना तथा धन, भूमि, संपत्ति, नारी विद्या आदि किसी भी ऐसी वस्तु, जिसे अपने पुरुषार्थ से अर्जित नहीं किया या किसी ने हमें भेंट या पुरस्कार में नहीं दिया, को लेने का विचार स्वप्न में भी नहीं आने देना, अस्तेय का पूर्ण स्वरूप कहलाता है। गृहस्थ यदि अति तृष्णा न करे, तो इस दोष से काफी हद तक मुक्त हो सकता है।
ब्रह्मचर्य: प्रभु का ध्यान करते हुए अपनी समस्त इन्द्रियों सहित गुप्तेन्द्रियों पर संयम रखना, विशेषकर मन, वाणी तथा शरीर से यौन सुख प्राप्त न करना ब्रह्मचर्य है।
सभी इन्द्रियों पर यम निमयों के आचरण द्वारा अधिकार प्राप्त करके आत्मोत्थान का प्रयत्न करना, असत्य आचरण, चोरी, मांस भक्षण, खट्टे-तीखे पदार्थ खाना, मादक द्रव्य का सेवन करना, जुआ खेलना, काम क्रोध, लोभ, मोह, मैथुन आदि का त्याग करना ब्रह्मचर्य है।
अपरिग्रह: ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों के विषय रूप भोगों के उपयोग में या विषयों का उपार्ज़न व संग्रह करने में, उनकी रक्षा करने, उन्हें स्थिर रखने में हिंसा तथा उनकी क्षीणता में होने वाले कष्टों को देखकर उन पर विचार करके उन्हें मन, वचन, कर्म से स्वीकार न करना अपरिग्रह कहलाता है।
इस प्रकार गुण-दोष की निर्णायक बुद्धि जब इन विषयों को भोगने में पाप तथा हिंसा का निश्चय करती है, तभी अपरिग्रह होता है, अन्यथा यह परिग्रह है, विषय उपभोग है, विषय सेवन है।