सेठ उदयमल अवंतिका के अग्रणी धनाढ्य लोगों में माने जाते थे। वह हर समय भिक्षुओं, अभावग्रस्त लोगों तथा रोगियों की सहायता केलिए तत्पर रहा करते थे। एक बार उनके मन में आया कि यदि वह एक लाख रुपया एक साथ दान कर दें, तो उन्हें जहां पुण्य प्राप्त होगा, वहीं राज्य के सबसे बड़े दानी केनाते राजा से भी सम्मान प्राप्त होगा। उन्होंने अपनी मां से कहा, `मां, मैं एक लाख रुपये दान करना चाहता हूं।´ मां ने कहा, `बेटा, यह तो बहुत श्रेष्ठ संकल्प है। तू इन रुपयों को नगरी में मजदूरी करके जीवन यापन करने वाले गरीबों की कन्याओं के विवाह में लगा दे।´
सेठ ने कहा, `मां इससे कोई लाभ नहीं होगा। मैं ये रुपये राजपुरोहित को दान करना चाहता हूं। वह राजा से कहकर मुझे सबसे बड़े दानवीर की उपाधि से अलंकृत करा सकते हैं। मां समझ गई कि यह निष्काम दान नहीं, बल्कि लोभवश दान करना चाहता है। सेठ ने राजपुरोहित को सादर आमंत्रित किया। उन्हें बैठाकर कहा, `मैं आपको यह लाख रुपया दान करना चाहता हूं। ऐसा दान आपको कभी राजा से भी नहीं मिला होगा। मैं सबसे बड़े दानी के रूप में सम्मान पाना चाहता हूं।´ राजपुरोहित स्वाभिमानी विद्वान ब्राह्मण थे। उन्होंने जेब से चांदी का सिक्का निकाला और लाख रुपये की ढेरी पर रखकर बोले, `सेठ जी, मैंने एक रुपया मिलाकर इसे एक लाख एक कर दिया है। आप इसे किसी परोपकार के कार्य पर खर्च कर दें। आपने ऐसा त्याग भी न देखा होगा।´
ऐसा त्यागी भी न देखा होगा
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अनीति का धन घातक
25 03 2007काशी क्षेत्र के एक राजा समय-समय पर एक संत के पास पहुँचकर उनका सत्संग कर आशीर्वाद लिया करते थे। वह उनसे राज्य की कमियों पर प्रकाश डालने को भी कहा करते थे, जिससे सुधार किया जा सके।
संत जी को कुछ भक्तजनों से पता चला कि राजकोष भरने के लिए कुछ कर्मचारी अवैध धंधे कर रहे हैं। जंगल में शराब की अवैध भटि्ठयां चलाकर शराब बनाई जाती है। कई क्षेत्रों में जुए के अड्डे खुल गए हैं। कर्मचारी उनसे कर वसूल करके राजकोष में ज्यादा से ज्यादा धन जमा करके राजा को खुश करते रहते हैं। एक दिन राजा कुटिया पर पहुँचे। संत जी ने पूछा, `इस वर्ष फसल अच्छी नहीं हुई। अकाल के कारण लोग परेशान रहे। राजकोष की वृद्धि में भी गिरावट आई होगी।´ राजा ने बताया कि करों की वसूली से प्राप्त धन में तो निरंतर वृद्धि हो रही है। संत जी बोले, `आप आज रात हमारे साथ जंगल का भ्रमण करें।´ रात के समय रथ में सवार होकर दोनों निकले। संत जी ने कहा, `उस ओर जाकर देखें कि रात में रोशनी में क्या हो रहा है।´ राजा व मंत्री ने देखा कि जगह-जगह शराब की भटि्ठयों में शराब बन रही है। पास में ही जुआघर भी चल रहा है। राजा यह देखकर भौंचक्का रह गया।
संत जी बोले, `राजन, राजा को करों के स्त्रोत का पता लगाते रहना चाहिए। अनीति का धन राजा व प्रजा, दोनों के लिए विनाशकारी होता है। आप तुरंत अवैध धंधे बंद करा दें।´
प्रस्तुति : शिवकुमार गोयल
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मायाजाल से मुक्ति
25 03 2007दत्तात्रेय स्वभावत: जिज्ञासु थे। वह एक दिन सोचने लगे कि अधिकांश व्यक्ति साधना करते हैं, प्रयास करते हैं, फिर भी उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होता। आत्मज्ञान संबंधी जिज्ञासाओं के समाधान के उद्देश्य से वह प्रजापति के पास पहुंचे और विनम्रता से बोले, `मुझे आत्मज्ञान के उपाय बताने की कृपा करें।´ प्रजापति ने कहा, `ग्रंथ पढ़ने या किसी के बताने से तुम्हें आत्मज्ञान नहीं होगा। तुम किसी भी प्राणी की गतिविधियों का एकाग्रचित्त होकर अध्ययन करो। पशु-पक्षी व कीट-पतंग तक के जीवन से तुम व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान कर सकते हो।´
दत्तात्रेय घर से निकल पड़े। एक मंदिर में रुके। उनकी दृष्टि कमरे के कोने में एक मकड़ी पर पड़ी। उन्होंने देखा कि मकड़ी जाल बुन रही है। जाला बुनते-बुनते स्वयं भी उसमें फंसती जा रही है। कुछ ही क्षणों में मकड़ी ने जाले के एक भाग को इकट्ठा किया और मुंह में निगल लिया। दत्तात्रेय ने जान लिया कि मानव स्वयं ही मायाजाल बुनता है। अपने बुने मायाजाल, लोभ, लालच आदि में फंसकर वह तरह-तरह के दुख उठाता है। जब उसका विवेक जागृत होता है, तो स्वत: मायाजाल के भ्रम की अनुभूति कर उससे मुक्त हो जाता है। दत्तात्रेय जी ने अन्य पशुओं के जीवन और उनके कार्य-कलापों से शिक्षा ग्रहण की। वह कहा करते थे, `पशु-पक्षी भी मेरे गुरु हैं, जिनसे मैंने प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त किया है।´
प्रस्तुति : शिवकुमार गोयल
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राम के गुण गाओ, उसी के हो जाओ
25 03 2007परमात्मा के चरणों में ही जीवन है, उसी की छाया में विश्व फल-फूल रहा है। यही परमात्मा यानी राम की कथा के श्रवण से कोटि-कोटि पापों का क्षय हो जाता है। जिसने भी रामकथा की सरिता में गोते लगाए, समझो उसने अपने उद्धारक सेतु का निर्माण कर लिया।
मानव जीवन में सात वस्तुएं मनुष्य को प्रभावित करती हैं जिनमें संशय, मोह, भ्रम, भय, अज्ञान, दुर्भाग्य और मानसिक रोग हैं।
राम कथा की मार्मिकता को जितना समझो, उतना कम है।
जीवन की सच्चाई इसमें समाहित है। इसी सच्चाई को दर्शाती है रामकथा। यह भौतिक संसार हमें कहां ले जा रहा है, इसका ज्ञान कराती है रामकथा। मोह का त्याग करना ही मोक्ष है, इसका संपूर्ण परिचय देती है रामकथा।
राम से बड़ा राम का नाम है। मिसाल के तौर पर, लंका में चढ़ाई से पहले समुद्र पर जो पुल बना, वह राम के नाम से ही संभव हो पाया। पत्थरों पर राम का नाम अंकित नहीं होता, राम के भक्त नल और नील उन पत्थरों को स्पर्श नहीं करते तो विशाल समुद्र पर बांध नहीं बनाया जा सकता था। इसके अलावा राम के परम भक्त हनुमान ने भी अपने हर साहसिक कार्य से पहले राम का नाम लिया और अपने उन कार्यों को सकुशल पूर्ण किया।
राम का नाम आज भी प्रासंगिक है। हनुमान का नाम लेने मात्र से भी उनके नाम की वंदना होती है। कलियुग में राम का नाम और अनन्यभक्त हनुमान का स्मरण, मानव जीवन का उद्धार करने वाला है। यही मानव जीवन का आधार है। अगर यह मानकर जीवन को जीया जाए तो मानो आप सब भौतिक वस्तुओं से उबर गए।
इसी राम नाम ने विश्व का निर्माण किया है। जिस भगवान ने मुझको बनाया है, उसी परमपिता परमात्मा ने बाकी लोगों को भी बनाया है। जब सभी का निर्माता वही ईश्वर है, जब सभी उसी ईश्वर की आराधना करते हैं तो फिर मैं कौन होता हूं ईश्वरीय कृति में विभेद करने वाला। जब मेरे ठाकुर के लिए सब समान हैं तो मेरे लिए भी सब समान हैं।
राम तो सभी के लिए समान भाव रखते हैं। सभी उनकी संतान हैं। वे तो सभी का भला चाहते हैं। फिर मनुष्य उन्हें कैसे भूल सकता है? राम नाम की जीवन में सार्थकता को समझाने केलिए किसी चीज को जटिल नहीं कर देना चाहिए। यह तो सीधी-सादे, मधुर वचनों में भक्तों के सामने व्याख्यायित होना चाहिए, बल्कि जो जटिल है उसे सरल बनाकर प्रस्तुत करना, राम नाम को हर मनुष्य तक पहुँचाना मेरा प्रयास है। वैसे मैं जन-जन तक राम की महत्ता को पहुंचाना चाहता हूं। इसको जटिल कर देने से क्या लाभ? फिर राम का नाम तो सभी लोगों के लिए समान है, तो क्यों न इसको सुनने का पुण्य सभी को समान रूप से वितरित किया जाए।
इसलिए बहुत से लोग कथा सुनने आते हैं। उनमें हर आदमी तो बहुत विद्वान होता नहीं कि उनसे गूढ़ बातें की जाएं। जो भी आते हैं, वह गूढ़ बातों को समझने आते हैं, तो मैं हल्की-फुल्की बातों के जरिए आध्यात्म की गूढ़ बातें हर इंसान को समझाने की कोशिश करता हूं।
वास्तव में जीवन का लक्ष्य ही राम नाम का स्मरण मानकर चलें। मान लें कि राम का स्मरण करके जहां वह ले चलें, वहां चलते जाएं। वैसे भी मनुष्य व्यर्थ ही मन को अशांत कर लेता है और तुच्छ चीजों में फंसकर जीवन को नष्ट कर रहा है। वह जिस आनंद और शांति की प्राप्त चाहता है, उसको केवल राम के नाम में लीन रहकर ही प्राप्त कर सकता है। एक बार जरा इसी को अपना लक्ष्य मानकर चलें। अपनी मंजिल तक आप खुद-ब-खुद ही प्राप्त कर लेंगे। अपने राम के पीछे हो लें, इससे ज्यादा सुखद मार्ग कोई है ही नहीं।
वह कब तुम्हारी उंगली पकड़कर तुम्हें मोक्ष दिला देगा, इसका आभास भी तुम्हें होने न पाएगा। जीवन का सत्य तो यही है कि उसके बताए पथ पर बढ़ते रहो और सोचो कि जहां तक कदम साथ दे वहां तक चलते ही जाना है। फिर पता चलेगा कि वह परमपिता तुम्हें कभी हिम्मत हारने ही नहीं देगा।
(प्रवचन पर आधारित)
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प्रेम, करुणा व अहिंसा की पुण्यभूमि वीरायतन
25 03 2007सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आचार्य श्री चंदनाश्रीजी को इस वर्ष का देवी अहिल्या पुरस्कार दिया जा रहा है। सचमुच ‘वीरायतन’ (नालंदा-बिहार) जिसका अर्थ है भगवान महावीर का पवित्र स्थान और उनकी पुण्यभूमि, आचार्य श्री चंदनाश्रीजी की ऐसी कर्मस्थली है जहां कण-कण में प्रेम, करुणा और अहिंसा का समावेश है। आज यह साधनास्थली उनकी सद्प्रेरणा से कर्म, ज्ञान तथा प्रेम की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कर रही है। ‘स्व-कल्याण’ को विसर्जित कर ‘पर-कल्याण’ को मानव जीवन का आदर्श बनाने की प्रेरणा देती यह कर्मभूमि राजगृह के स्वर्णिम ऐतिहासिक अतीत को जीवंत करता पुण्य-क्षेत्र भी है और मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य का प्रेरणा-केंद्र भी!
वीरायतन के परिसर में जब श्री चंदनाश्रीजी की मधुर वाणी प्रवचनों के माध्यम से प्रस्फुटित होती है तो ऐसा लगता है, मानो वहां स्वयं भगवान महावीर प्रेम और करुणा का संदेश दे रहे हों। वीरायतन जैन धर्म के मर्म को समझने के साथ ही मानव-सेवा को किन ऊंचाइयों तक ले जाया जा सकता है, यह देखने व समझने का आध्यात्मिक स्थान भी है।
चालीस एकड़ क्षेत्र में संस्थापित जिस विशाल वीरायतन को आज हम देखते हैं, वहां आज से लगभग 29 वर्ष पूर्व पानी की एक बूंद भी नहीं थी। सूखी झाड़ियों तथा चट्टानी पत्थरों के अलावा वहां ऐसा कुछ भी नहीं था जिससे थोड़ी भी तृप्ति का एहसास किया जा सके। इसी वीरान स्थल पर श्री चंदनाश्रीजी ने जिस साहस का परिचय दिया वह अद्भुत है। वे तेजोमय संकल्प से युक्त होकर इस स्थल पर आईं, इसका अवलोकन किया और फिर दृढ़ संकल्प तथा आत्मविश्वास से परिपूर्ण होकर चट्टानों में फूल खिलाने का प्रयत्न शुरू कर दिया। उनके दृढ़ संकल्प में एक बहुत बड़ी शक्ति समाहित थी, तभी तो वे इस वीरान धरती पर गंगा प्रवाहित करने में सफल हुईं। आज इस स्थल पर सेवा के साथ ही धर्म तथा कर्म की गंगा कल-कल करती बह रही है और निरंतर उसका विस्तार हो रहा है। देशभर में अपने सेवाकर्म के लिए सुविख्यात एवं विदेशों तक प्रतिष्ठित वीरायतन में चलने वाले ‘नेत्र ज्योति सेवा मंदिरम्’ अस्पताल में मरीजों के लिए 100 से अधिक शय्याएं उपलब्ध रहती हैं। प्रतिमाह आंख के 600 ऑपरेशन होते हैं तथा दस हजार नेत्र-पीड़ित रोगमुक्त होते हैं। आधुनिक उपकरणों से सुसिज्जत इस अस्पताल में मरीजों को ऑपरेशन के साथ ही दवाइयां, चश्मा, भोजन, निवास आदि की सुविधाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं।
मंदिर की तरह पवित्र इस सेवा मंदिरम् में श्री चंदनाश्रीजी के पावन मार्गदर्शन में मरीजों को प्रतिदिन प्रार्थना और प्रवचन के माध्यम से दुव्र्यसन मुक्ति, जातीय सद्भावना, ग्राम सुधार, वृक्षारोपण एवं मांसाहार त्याग की प्रेरणा देने हेतु सुंदर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस आत्मीय तथा सुखद वातावरण में रहने के बाद वहां के मरीज यही कहते हैं कि ‘हमें नेत्र ज्योति सेवा मंदिरम् में शरीर की ही नहीं, मन की आंखें भी प्राप्त होती हैं।’ वीरायतन का सेवा क्षेत्र धीमे-धीमे विस्तार की ओर ही अग्रसर होता जा रहा है। यहां पिछले 6 वर्षों से पोलियो पर भी कार्य शुरू हो गया है। वीरायतन परिसर में ही बना पोलियो अस्पताल बिहार के नागरिकों की एक बहुत बड़ी आश्यकता को पूरा कर रहा है।
आचार्य श्री चंदनाश्रीजी के साथ एक और अद्वितीय राष्ट्र गौरव भी जुड़ा हुआ है। जैन समाज के 2600 वर्षों के इतिहास में वे ऐसी पहली महिला हैं, जिन्हें ‘आचार्य’ की उपाधि प्राप्त हुई है। उन्होंने उत्तराध्यन-सूत्र का हिन्दी अनुवाद भी किया है। वे कहती हैं, ‘लक्ष्य सही हो और गति चाहे धीमी हो, धीरे-धीरे ही चलते चलें, एक-एक कदम भी क्यों न चलें, चलें तो सही। हो सकता है कि कुछ क्षण विश्राम के लिए पड़ाव भी हो, किंतु लक्ष्य उस धीमी गति के द्वारा भी पाया जा सकता है। लक्ष्य की दिशा में यात्रा न होकर, विपरीत दिशा की ओर हो, तो कितनी भी तेज यात्रा हो, वह यात्रा जीवन को भटकाएगी, उलझाएगी, गलत रास्ते की तरफ ले जाएगी, लक्ष्य तक नहीं पहुंचा पाएगी।’
श्री चंदनाश्रीजी का कर्मक्षेत्र वीरायतन वह स्थान है जहां किसी भी मनुष्य का न कोई धर्म, जाति, संप्रदाय और न ही कोई प्रांत होता है। वहां मनुष्य केवल मनुष्य होता है और इसी भाव से वहां उसकी सेवा-सुश्रुषा की जाती है। भगवान महावीर की साधना और देशना भूमि, गौतम जैसे महान गणधरों की निर्वाण भूमि वीरायतन के आंगन में, मानव सेवा से जुड़े पवित्र-पावन उद्देश्य पर स्वयं के संपूर्ण-समर्पण का अद्भुत समन्वय है, आचार्य श्री चंदनाश्रीजी।
- ललित भाटी
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आकर्षण का केंद्र बनता शिवपुर तीर्थ
25 03 2007जन-जन की आस्था व समर्पण का प्रमुख केंद्र है शिवपुर (मातमोर), जो अपने मनोहारी और चमत्कारी वातावरण के कारण यहाँ एक बार आने वाले दर्शनार्थी को बार-बार आने पर मजबूर करता है। यह अनूठा तीर्थ स्थल प्रदेश के देवास जिले की बागली तहसील में चापड़ा से मात्र 8 कि.मी. दूर इंदौर-बैतूल राष्ट्रीय राजमार्ग 59-ए पर स्थित ग्राम मातमोर से 3 कि.मी. दक्षिण दिशा में स्थित है।
प्रदेश ही नहीं अपितु राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र राज्य के हजारों दर्शनार्थियों के लिए यह स्थल महत्वपूर्ण होता जा रहा है। लगभग 2 करोड़ की लागत से निर्मित दुनिया का एकमात्र श्री त्रिभुवन भानु पाश्र्वनाथ भगवान का रथाकार मंदिर, स्वयंभू श्री माणिभद्र वीर बाबा का मंदिर, श्री सिद्ध चक्र गुरु मंदिर की भव्यता व कलात्मकता देखते ही बनती है। यह लगभग 35 बीघा क्षेत्रफल में फैला तीर्थ है।
समाज के संत पू. पन्यास प्रवर श्री वीररत्नविजयजी का इस धरा पर पावन पदार्पण होने के बाद ही तीर्थ की कल्पना ने आकार लेना प्रारंभ किया। अपने आराध्य देव की खोज में निकले मुनिश्री को इस धरा पर पहुँचते ही यहाँ का प्राकृतिक वातावरण भा गया। ध्यान लगाते ही मुनिश्री को दिव्य संकेत मिला। 23 मार्च 1988 को इस पावन भूमि पर भूमिपूजन संपन्न हुआ। भूमिपूजन के बाद लगभग 2 माह के समय में ही 19 मई 1988 बैशाख शुक्ल छठ के दिन रवि पुष्य नक्षत्र में तीन आम्र वृक्षों के मध्य स्वयंभू श्री माणिभद्र वीर बाबा का प्रकटीकरण हुआ। तभी से सिलसिला शुरू हुआ इस तीर्थ स्थल को महातीर्थ बनाने का।
स्वयंभू बाबा श्री माणिभद्र को भव्य मंदिर बनाकर प्रतिष्ठित किया गया। प्रतिवर्ष बसंत पंचमी पर बाबा का जन्मोत्सव पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाने का निश्चय किया गया। प्रथम बसंत पंचमी मेले पर मुनिश्री के सान्निध्य में हवन-पूजन का आयोजन हुआ। 14 फरवरी 1994 को गुजरात से पत्थर आए, राजस्थान के कारीगरों ने उन्हें दिल खोलकर तराशा और देखते ही देखते दुनिया का सबसे बड़ा रथाकार जैन मंदिर अपनी भव्यता, कलात्मकता व आस्था के अनुरूप बनकर तैयार हो गया।
इस रथाकार मंदिर में 17 प्रभु प्रतिमाओं से समालंकृत मुख्य मंदिर है। मुख्य गंभारा (सभागृह) के गुम्बज में देव-देवी, चामरधारी (इंद्र-इंद्राणी) तथा श्रावक-श्राविकाओं से युक्त 24 तीर्थकरों की प्रतिमाओं को देखकर मन को अद्भुत शांति मिलती है। रथाकार मंदिर के आठों पहियों पर जैन संतों के 14 स्वप्नों की कलाकृति तथा अष्ट मंगल के प्रतीक चित्र उत्कीर्ण हैं। रथाकार मंदिर को चलायमान-सा प्रतीत करते दो काष्ठ (लकड़ी) निर्मित घोड़े हैं, जो अपने आकार व सजीवंतता से श्रद्धालुओं को प्रभु के दर्शन के लिए खींचते हैं।
तीर्थ में प्रवेश करते ही रथाकार मंदिर के दाहिनी ओर माणिभद्र बाबा का चमत्कारी मंदिर है तथा बाईं ओर श्री सिद्ध चक्र गुरु मंदिर है। गुरु मंदिर बनाने में उड़ीसा के कलाकारों ने पाषाण में अपनी रचना शक्ति का बखूबी उपयोग कर प्राचीन शिल्प की याद ताजा करा दी। गुरु मंदिर के गुम्बज में भगवान सुधर्मा स्वामी से लेकर जैनाचार्य श्री दान सूरीश्वरजी म.सा. तक 75 सूरी देवों की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं।
उक्त तीनों प्रमुख मंदिरों के अलावा ज्ञान मंदिर, धर्मशाला, भोजनशाला की भी व्यवस्था है, जहाँ संपूर्ण सुविधाएँ श्रद्धालुओं को उपलब्ध करवाई जाती हैं। इस महातीर्थ की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि यहाँ अभी तक करोड़ों रुपए के निर्माण कार्य हो चुके हैं, लेकिन कभी किसी प्रकार का धन संग्रहण (चंदा) नहीं किया गया।
इंदौर व देवास से मात्र 60 कि.मी. दूर स्थित इस महातीर्थ पर प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी बसंत पंचमी पर श्री माणिभद्र वीर बाबा का जन्मोत्सव धूमधाम के साथ मनाने की तैयारियाँ की जा रही हैं। शिक्षा, चिकित्सा, मानव सेवा, गोसेवा आदि से संबंधित अनेक परोपकारी योजनाओं का क्रियान्वयन भविष्य में किया जाएगा।
-अशोक माहेश्वरी
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धर्म को वैज्ञानिक दृष्टि देती पुस्तक
25 03 2007प्रस्तुत पुस्तक ‘हिंदू धर्म के वैज्ञानिक तथ्य’ वर्तनाम विज्ञान युग की मूल प्रवृत्ति- क्या, क्यों कैसे? के आधार पर लिखी गई एक तथ्यात्मक रचना होते हुए हिंदू धर्म के अनुत्तरित प्रश्नों के वैज्ञानिक शैली में दिए गए सटीक उत्तरों से पूर्ण है।
प्रस्तुत पुस्तक का अध्ययन करते हुए मुझे ऐसा लगा, मानो कोई ऋषि वैदिक ज्ञान-विज्ञान को वर्तमान विज्ञान युग सेन केवल जोड़ना चाहता है बल्कि भारतीय मनीषा की छाप वर्तमान पर डालकर यह प्रमाणित करना चाहता है कि आगामी युग वेद-विज्ञान का युग होगा।
विद्वान लेखक ने उच्च शिक्षा प्राप्त डॉक्टर, इंजीनियर तथा अन्य युवा वर्ग को हिंदू धर्म में व्याप्त परंपराओं के प्रति सही समझ उत्पन्न करने का प्रयास किया है। आज का युवक भारतीय परंपराओं की स्पष्ट समझ न होने के कारण, उनका उपहास करता रहता है। यह वर्ग इस कारण धर्म से विमुख होता जा रहा है। ऐसे युवक भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता और भारत की विश्व को देन आदि के ज्ञान के अभाव में उसकी महत्ता एवं उपयोगिता पर कैसे गर्व कर सकता है! न निष्ठा और न विश्वास।
दूसरी ओर समाज के मार्गदर्शक कर्मकांड कराने वाले पंडित हिंदू धर्म के श्रुति आधारित वैज्ञानिक तथ्यों के ज्ञान-विज्ञान के अभाव में समाज को उचित मार्गदर्शन एवं नेतृत्व देने में अपने को असमर्थ पाते हैं। प्रस्तुत पुस्तक के अभाव को पूर्ण करने और इस समस्या का निराकरण में समर्थ है।
पुस्तक के प्रारंभ में लिखा है- ‘आज विज्ञान अंतरिक्ष के रहस्यों में अपनी उपस्थिति का आभास देने लगा है। और हमारा धार्मिक कर्म क्षेत्र ठंडे पानी में डूबने और राख में लिपटाने का पर्याय बना हुआ है। ऐसे समय में वास्तवित तथ्यों का प्रायोगिक ज्ञान ही सिद्ध कर पाएगा कि श्रेष्ठता के आयाम कौन से है।’- चैतन्य
लेखक ने पुस्तक की भूमिका में बतलाया है कि ‘हिंदू धर्म पूर्णत: वैज्ञानिक धर्म है।’ हिंदू-धर्म के जिन तत्वों और विधाओं को हमें आँख बंद करके देख रहे हैं, उन पर वैज्ञानिक दृष्टि से प्रकाश डाला गया है। प्रकाश स्तंभ की तरह जिन पर प्रकाश डाला गया है, वे हैं- मंदिर, घंटा, मूर्ति, शंख, पुष्प, सिंदूर, दीपक, तिलक, यज्ञ, संस्कार, गणेश, विवाह, तुलसी, पर्व, वृक्ष, सूर्य, मंत्र, शिखा आदि के संदर्भ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भ्रम दूर करने के प्रयास इस पुस्तक में परिलक्षित होते हैं, जो प्रशंसनीय हैं।
कुल मिलाकर पुस्तक हिंदू धर्म का ज्ञान-कोष है। धर्म में भावनात्मक दृष्टि से निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों के लिए यह पुस्तक वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करने में सहायक है। पुस्तक का मुखपृष्ठ, कागज, छपाई-सफाई आदि श्रेष्ठ होते हुए अत्यंत उपयोगी सामग्री निहित है इस पुस्तक में। पुस्तक पढ़ने और पढ़ाने लायक है अत: संग्रहणीय है।
पुस्तक- हिंदू धर्म के वैज्ञानिक तथ्य
लेखक- जगदीश जोशी ‘चैतन्य’
प्रकाशक- धर्म विज्ञान शोधन्यास, 7 कमला नेहरू मार्ग, उज्जैन
मूल्य- 100/-
प्राप्ति स्थान- धर्म विज्ञान शोध न्यास, 106, टेलीफोन नगर, इंदौर
- जगदीश दुर्गेश जोशी
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जन्माष्टमी पर मथुरा में जन सैलाब उमड़ा
25 03 2007श्रीकृष्ण के प्रकटोत्सव पर विभिन्न आयोजनों से बुधवार को समूचा ब्रज मंडल कृष्णमय हो गया। विश्व विख्यात द्वारिकाधीश मंदिर में बुधवार को प्रात: मंगला के दर्शन के लिए तीर्थयात्रियों का सैलाब मंदिर में हो रहे अभिषेक की एक झलक पाने के लिए बेताब नजर आ रहा था।
मंदिर के दर्शन खुलते ही पुजारी नाना मुखिया के नेतृत्व में अभिषेक कार्यक्रम प्रारंभ किया। इसके तहत ठाकुर जी को वैदिक मंत्रों के मध्य पहले यमुना जल से स्नान कराया गया। इसके बाद दूध, दही, घृत, शहद और बूरे के पंचामृत से अभिषेक किया गया। लगभग आधा घंटे तक चले इस कार्यक्रम की झलक पाने के लिए जबर्दस्त धक्का मुक्की हुई। मंदिर के प्रबंधकों ने यद्यपि क्लोज सर्किट टी.वी. के माध्यम से भक्तों के दर्शन की वैकिल्पक व्यवस्था की थी।
मंदिर के प्रबंधक एस.पी.गौतम ने बताया कि अगले वर्ष से बड़े स्क्रीन के क्लोज सर्किट टी.वी. लगाने की व्यवस्था की जाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि एक भक्त की आर्थिक मदद से ठाकुर जी का चांदी का पालना बनवाया गया है जो गुरुवार को डाला जाएगा। इस मंदिर में बुधवार को दर्शनार्थियों का तांता लगा रहा तथा जन्म के दर्शन के बाद श्रद्धालुओं में प्रसाद का वितरण भी किया गया।
वृन्दावन के राधा रमण मंदिर में आज वैदिक ऋचाओं के मध्य मुख्य श्री विग्रह का 21 मन दूध, दही, बूरा, शहद और घृत से अभिषेक किया गया। सबसे पहले मुख्य श्री विग्रह का यमुना जल से अभिषेक कराया गया। इसके बाद औषधि स्नान भी हुआ। लगभग पांच घंटे चले इस कार्यक्रम के बाद चरणामृत का वितरण किया गया। मथुरा में ही श्रीकृष्ण जन्मस्थान में बुधवार को सुबह से ही भक्तों का ऐसा हजूम उमड़ा कि व्यवस्थापकों को सुबह से लम्बी लाइनें लगवानी पड़ी।
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रोगमुक्त भी करता है रावण
25 03 2007मंदसौर, सोमवार, 26 सितंबर 2005
मंदसौर नगर में स्थायी रूप से निर्मित रावण की प्रतिमा के समक्ष लोग बच्चों को रोगमुक्त करने के लिए विशेष विधि के साथ प्रार्थना और पूजा-अर्चना करते हैं। दशहरे के दिन दहन के पहले सुबह की पूजा-पाठ के बाद लोग रावण के अंगूठे में लच्छा बांधकर बच्चों को ठीक करने के लिए मिन्नतें मांगते हैं।
मंदसौर नगर के खानपुरा क्षेत्र में रावण रूण्डी नामक स्थान पर नगर पालिका मंदसौर ने 35 फुट ऊंची रावण की प्रतिमा का निर्माण करवाया है। पूर्व में इसी स्थान पर नामदेव समाज द्वारा निर्मित ऐतिहासिक रावण के दस मुखों वाली भव्य प्रतिमा स्थापित थी। समूचे देश में संभवत: मंदसौर नगर ही एकमात्र स्थान होगा, जहां रावण की इतनी विशालकाय प्रतिमा बनी हुई है तथा यहां के निवासी इसकी पूजा-अर्चना भी करते हैं।
दशहरे की शाम बुराइयों के प्रतीक स्वरूप इसका दहन आतिशबाजी के साथ करते हैं। इस ऐतिहासिक प्रतिमा के पीछे किंवदंती है कि रावण दशपुर (मंदसौर) का दामाद था। रावण की धर्मपत्नी मंदोदरी मंदसौर की निवासी थी। मंदोदरी के कारण ही दशपुर का नाम मंदसौर माना जाता है तथा नामदेव समाज इसी मान्यता के आधार पर रावण का सम्मान करता रहा है।
विशाल रावण की प्रतिमा कई बार हवा, पानी व बिजली गिरने के कारण खंडित हुई, जिसे समय-समय पर ठीक करवाया गया। लेकिन इस बार नगर पालिका मंदसौर ने इसकी मरम्मत करवाने की बजाए नई प्रतिमा का ही निर्माण इंदौर के आर्किटेक्ट श्री महेन्द्र कोटवानी से करवा दिया। इसकी लागत 2 लाख 50 हजार रुपए आई है।
खानपुरा नामदेव समाज के लोग दशहरे के दिन प्रात: रावण की प्रतिमा की पूजा-अर्चना करते हैं तथा इस प्रतिमा के समक्ष कई व्याधियों के शिकार बच्चों को रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि इसके पैर में लच्छा बांधने से बच्चा बीमारी आदि से निजात पाकर स्वस्थ हो जाता है।
(दिलीप दुबे)
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महामृत्युंजय शिव रथ यात्रा 7 को
25 03 2007इन्दौर। महामृत्युंजय भक्त मंडल इंदौर द्वारा 7 जनवरी को प्रात: 10 बजे से महेश्वर के महालक्ष्मी नगर से महामृत्युंजय शिव रथ यात्रा का आयोजन किया गया था। भगवान महामृत्युंजय की रथ यात्रा का आयोजन पहली ही बार हुआ। उल्लेखनीय है कि तिरुअनंतपुरम में प्रतिवर्ष वैशाख पूर्णिमा को आशुतोष भगवान शिव की रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। इसी प्रकार उज्जैन में महाकाल की पालकी यात्रा श्रावण मास में निकाली जाती है। वैदिक शास्त्रों एवं पुराणों में शिव को प्रसन्न करने, अकाल मृत्यु से बचने एवं असाध्य रोगों से मुक्ति पाने के लिए महामृत्युंजय ध्यान का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है। यह भी कहा जाता है कि यदि मारक ग्रह दशाओं के लगने से पूर्व महामृत्युंजय मंत्र और ध्यान किया जाए तो व्यक्ति की भावी दुर्घटना टल जाती है और यदि घटित होती भी है तो बहुत कम असर डालती है। भगवान मृत्युंजय की इस रथ यात्रा में महेश्वर नगर के निवासी भी उत्साह के साथ भाग लेंगे।
हिमालय स्थित महान योगीराज श्री वाचस्पति महाराज की प्रेरणा से रथयात्रा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें सभी धर्मप्रेमी जनता भाग ले सकती है।
अक्सर देखने में आता है कि अगर किसी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार की दुर्घटना हो जाती है और उसकी जान को खतरा हो, तब भगवान भोले की शरण में जाकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाता है। कई बड़े फिल्म अभिनेताओं से लेकर नेताओं के लिए खासतौर पर उज्जैन में महाकाल मंदिर में इसकी आराधना की जाती रही है। भगवान भोले की पालकी व यात्रा की परिपाटी तो कई सदियों से चलती आ रही है, परंतु शास्त्रों में वर्णित भगवान महामृत्युंजय की रथयात्रा भक्तमंडल इंदौर द्वारा लिया गया है। यह अपने आप में अनूठी घटना है जिसे हिमालय के योगीराज श्री वाचस्पतिजी महाराज की प्रेरणा से मूर्त रूप दिया जा रहा है। इसे सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय की भावना से आरंभ किया जा रहा है, जिसमें महेश्वर नगर के रहवासी भी बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।
वैदिक शास्त्रों एवंपुराणों में शिव को प्रसन्न करने व अकाल मृत्यु से बचने एवं असाध्य रोगों से मुक्ति पाने के लिए महामृत्युंजय जाप का उल्लेख शिव पुराण में किया गया है। पद्मपुराण उत्तराखंड में महर्षि मार्कण्डेय कृत महामृत्युंजय मंत्र व स्तोत्र का वर्णन है। पद्मपुराण में वर्णित दंत कथा के अनुसार मुनि मुकण्डु संतानहीन थे, अत: उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हें योग्य संस्कारों और तेजस्वी बालक का वरदान चाहिए तो उसकी आयु केवल सोलह वर्षहोगी। बालक का नाम मार्कण्डेय रखा गया और यह देखने में आया कि वह शिवभक्त है।
बालक की सोलह वर्ष की आयु पूर्णहोने पर यमराज स्वयं उसके प्राणों को हरने आए। बालक ने उन्हें देख स्नेह से शिवलिंग को कसकर पकड़ लिया और जैसे ही यमराज बालक के प्राण हरने के लिए आगे बढ़े तो शिवलिंग से भगवान शिव प्रकट हुए और महामृत्युंजय की उत्पित्त हुई। इसी प्रकार स्कंदपुराण (प्रभास खण्ड) में शुक्राचार्य द्वारा शिवजी की आराधना का उल्लेख है, जिसमें उन्होंने कहा है कि यदि तुष्टो महादेव विद्या देहि महेश्वर।
यथा जीविन्त संप्राप्ता मृत्यु संख्येपि जन्तव।।
हे महेश्वर महादेव यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो वह विद्या दीजिए जिससे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त प्राणी जीवित हो जाए। शिवजी द्वारा शुक्राचार्य को शक्तिशाली संजीवनी महामृत्युंजय विद्या वरदान के रूप में दी गई। विभिन्न पुराण ग्रंथों जैसे स्कंदपुराण, देवी भागवत पुराण, लिंग पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण व पद्मपुराण में मृत्युंजय साधना के विशिष्ट क्रम उल्लेखित हैं। इसके अतिरिक्त वाल्मीकि रामायण, दशमग्रंथ (सिक्खमत) किरातार्जुनीयम़ रामकृष्णलीलामृत में भी इसका उल्लेख है।
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