शैम्बो को वध के लिए बूचड़खाना ले जाया गया

29 07 2007

shambo महीनों से धर्म और सरकार के बीच विचित्र टकराव की वजह रहा पवित्र सांड़ शैम्बो की मौत निश्चित है। शैम्बो को गुरुवार की सुबह वेल्स के अधिकारी बूचड़खाना ले गए जहां उसे जहर की सुई देकर मौत की नींद सुला दिया जाएगा।

6 वर्षीय यह पवित्र सांड़ स्कंद वेल मंदिर में हिन्दू श्रद्धालुओं की आस्था और प्यार का प्रतीक बना हुआ था। वध के लिए अधिकारियों की गिरफ्त में आने से रोकने के लिए ब्रिटेन, स्विटजरलैंड और न्यूजीलैंड के दर्जनों हिन्दू मंदिर परिसर में मौजूद थे। सुरक्षाकर्मियों ने इन सभी हिन्दुओं को जबरन परिसर से हटाया और शैम्बो को अपने कब्जे में लिए। शैम्बो को भजन-कीर्तन, वैदिक मंत्रों के पाठ, प्रार्थना आदि के धार्मिक माहौल में अंतिम विदाई दी गयी। इस मौके पर सभी हिन्दू बेहद भावुक नजर आए और उनके चेहरे पर सरकार के प्रति नाराजगी और वितृष्णा का भाव स्पष्ट देखा जा सकता था। कई हिन्दुओं ने सरकार के खिलाफ जमकर आक्रोश प्रकट किया। शैम्बो को एक वाहन में लाद कर बूचड़खाना ले जाया गया। शुरू में हिन्दू कार्यकर्ताओं ने इन अधिकारियों को मंदिर परिसर में घुसने नहीं दिया। बाद में ये अधिकारी कोर्ट से वारंट लेकर वापस लौटे। पुलिसकर्मियों ने ताकत का इसतेमाल कर शैम्बो के इर्द-गिर्द बनी मानव श्रृंखला को तोड़ दिया।

द गार्जियन अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम के लिए शैमब्लॉग नाम से एक ब्लॉग खोला था। इस ब्लॉग पर कई लोगों की प्रतिक्रिया मिली। इस ब्लॉग पर कई लोगों ने शैम्बो के लिए हिन्दुओं द्वारा चलाए गए अभियान के खिलाफ प्रतिक्रिया दी है। कुछ लोगों ने इस पूरी कवायद को अतार्किक और आधुनिक सोच से परे करार दिया है। कई लोगों ने शैम्बो को मौत के घाट उतारे जाने के सरकारी फैसले पर विरोध भी जताया है। इस बीच स्कंद वेल मंदिर के एक अधिकारी माइकल ने वेल्स एसेंबली के रवैये की जमकर आलोचना की है। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस मंदिर को अपभ्रष्ट किया है और एक निर्दोष प्राणी की जिंदगी नष्ट कर दी है। हिन्दू फोरम ऑफ ब्रिटेन के महासचिव रमेश कल्लीदई ने इस पर गहरा दुख प्रकट किया है।





उड़ीसा में काली मंदिर में करीब 650 बकरों की बलि दी गई

6 05 2007

sacrifice स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रतिबंध के बाजवूद उड़ीसा में एक काली मंदिर में देवी को खुश करने के लिए करीब 650 बकरों की बलि दे दी गई। बकरों की बलि भद्रक जिले के रामेश्वर गांव के रक्षया काली मंदिर में दी गई।
यूं तो प्रशासन ने पशुओं की बलि पर रोक लगा रखी है। इसके बाजवूद मंदिर में बड़े पैमाने पर इन बेजुबानों की बलि ली गई। कुछ अधिकारियों और ग्रामीणों ने बड़े पैमाने पर पशुओं की बलि दिए जाने की पुष्टि की है। गांव के एक निवासी दिबाकर बारीक ने कहा कि हर साल हिन्दू महीने चैत्र में बकरों की बलि दी जाती है। हम रक्षया काली को बकरों की बलि इसलिए देते हैं, क्योंकि देवी मां हमारे गांव की रक्षक है और पिछले 72 वर्षों से यह परिपाटी चली आ रही है। इससे पहले इस मंदिर में भैंसों की बलि दी जाती थी। अब उनकी जगह बकरों को काटा जाता है। यहां तक कि स्थानीय पुलिस के कई जवानों ने भी इस प्रशासनिक रोक के उल्लंघन को होते देखा।
sacrificeएक पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया कि मंदिर में बलि बेदी के चारों ओर खून के परनाले बह रहे थे। यहां तक कि कुछ लोग बकरों का खून सिर पर लगा कर देवी से आशीर्वाद की कामना कर रहे थे। अधिकारी ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि कई लोगों को वहां खून का तिलक लगाए देखा गया। पिछले साल पशु अधिकारवादी कार्यकर्ताओं ने इस मंदिर में पशुओं की बलि पर हंगामा खड़ा किया था। तब राज्य के राजस्व मंत्री मनमोहन सामल की मौजूदगी में ही इस मंदिर में पशुओं की बलि दे दी गई थी। मंत्री को तब स्पष्टीकरण देना पड़ा था। एक सप्ताह पहले जिला प्रशासन ने इस बलि प्रथा को बंद कराने की कोशिश की थी। यहां तक कि शीर्ष जिला एवं पुलिस अधिकारी ने मंदिर कमेटी के सदस्यों और ग्रामीणों से इस मुद्दे पर बातचीत भी की थी। सूत्र ने बताया कि यह फैसला लिया गया था कि मंदिर में प्रतीकात्मक तौर पर एक ही पशु की बलि दी जाएगी, लेकिन इस समझौते का उल्लंघन किया गया।





न्यूजीलैंड में कई हिन्दू मंदिर बनेंगे

6 05 2007

ऐसे में जब न्यूजीलैंड में भारतीयों की आबादी बढ़ रही है और भारतीय अपनी धार्मिक व सांस्कृतिक पहचान को लेकर पहले से कहीं अधिक सजग हो गए हैं, देश में हिन्दू मंदिरों की तादाद में भारी इजाफा होने जा रहा है।
जनगणना विभाग स्टैटिस्टिक्स न्यूजीलैंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 64,392 हिन्दू हैं। यह आंकड़ा वर्ष 2006 का है। यह विभाग विभिन्न समुदायों की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को भी पुष्ट करता है। इससे पहले जो जनगणना की गई थी, उसके मुकाबले 2006 की जनगणना में हिन्दुओं की आबादी में 61.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी दिखाई गई है। इसके अलावा देश में 36,072 मुस्लिम और 9507 सिख हैं। पिछली गणना के मुताबिक इस गणना में मुसलमानों की तादाद में 52.6 और सिखों की तादाद में 83 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्शायी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यूं तो न्यूजीलैंड के बहुसंख्यक समुदाय ईसाइयों की तुलना में अभी भी हिन्दुओं, सिखों और मुसलमानों की संख्या नगण्य है, लेकिन हाल के वर्षों में इन अल्पसंख्यकों की तादाद में नाटकीय बढ़ोत्तरी देखी गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एशियाई मूल के लोगों की तादाद न्यूजीलैंड में तेजी से बढ़ रही है। इस समुदाय को न्यूजीलैंड में सर्वाधिक रफ्तार से फलता-फूलता समुदाय माना गया है। पिछले पांच वर्षों में कुल एशियाई आबादी में करीब 50 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है और यह संख्या बढ़कर 3,54,552 हो गई है। इस अवधि में न्यूजीलैंड की कुल आबादी में महज 7.8 फीसदी की बढ़ोत्तरी ही दर्ज हुई है। जाहिर है एशियाइयों की आबादी में गुणात्मक बढ़ोत्तरी हुई है। अधिकांश एशियाई ऑकलैंड और उसके आसपास के इलाकों में केंद्रित हैं। विक्टोरिया विश्वविद्यालय में धार्मिक विभाग के प्रोफेसर जिम वीत्च ने बताया कि हिन्दुओं की बढ़ती धार्मिक आस्था के मद्देनजर देश में हिन्दू मंदिरों की संख्या में गुणात्मक बढ़ोत्तरी होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में देश में धार्मिक इमारतों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है।





भगवान जगन्नाथ के रथों का निर्माण शुरू

6 05 2007

बढ़ई और कारीगर भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक रथ यात्रा के लिए विशाल तीन रथों के निर्माण में लग गए हैं। इसके साथ ही इस सालाना रथ यात्रा की तैयारी जोर पकड़ने लगी है। रथ यात्रा में भाग लेने के लिए देश-दुनिया से हजारों श्रद्धालु पवित्र धर्मनगरी पुरी आते हैं।
परंपरा के मुताबिक इन रथों के निर्माण की रस्म हिन्दू पंचांग के बैसाख महीने के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन से शुरू होती है। मंदिर के अधिकारी लक्ष्मी धर पूजा पांडा ने इसकी जानकारी दी। इस साल यह दिन शुक्रवार को पड़ा। शुक्रवार से इन रथों के निर्माण की रस्म शुरू हो गई। पांडा ने बताया कि करीब 100 कारीगरों ने इन रथों का निर्माण शुरू कर दिया है। इन रथों का निर्माण भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के लिए किया जाता है। इन तीनों की प्रतिमाओं को इन विशाल रथों पर रखकर घुमाया जाता है। भुवेनश्वर से 56 किलोमीटर दूर जगन्नाथ पुरी शहर में इस धार्मिक जलसे को देखने के लिए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है। रथ यात्रा की शुरुआत जगन्नाथ मंदिर से होती है और रथों को खींच कर इसी शहर के एक दूसरे मंदिर गोंदीचा मंदिर तक ले जाया जाता है।
इस साल यह रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी। इन विशाल काष्ठ ढांचों को खींचने के लिए लाखों भक्त पुरी में जमा होंगे। चार मोटी रस्सियों के सहारे प्रत्येक रथ को खींचा जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ को नंदीघोष, बलभद्र के रथ को तलाध्वज और सुभद्रा के रथ को पद्म ध्वज कहा जाता है। नंदीघोष में 16 पहिए होते हैं और इसकी ऊंचाई 45 फुट होती है। रथ पर बने मंदिर पर लाल और पीले रंग के कपड़े चढ़ाए जाते हैं। तलाध्वज रथ की ऊंचाई 44 फुट होती है और इसमें 14 पहिए होते हैं। इस रथ की छत का रंग लाल और हरा होता है। रथ के शीर्ष हिस्से पर एक फल रखा जाता है। पद्म ध्वज रथ की ऊंचाई 43 फुट होती है। इसमें 22 पहिए होते हैं।





अमरनाथ के तीर्थ यात्रियों को मिलेगी अच्छी सुविधाएं

6 05 2007

इस बार जम्मू-कश्मीर स्थित अमरनाथ गुफा की यात्रा करने वाले तीर्थ यात्रियों को पहले से कहीं अधिक बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। इस यात्रा के रास्ते में स्थित शौचालयों की भरपूर साफ-सफाई की जाएगी वहीं तीर्थ यात्रियों के लिए विशुद्ध पेयजल और सामुदायिक रसोईघर की व्यवस्था होगी।
अमरनाथ गुफा की यात्रा 30 जनवरी से शुरू होगी और यह यात्रा 28 अगस्त तक जारी रहेगी। तीर्थ यात्रियों को प्रदूषण मुक्त माहौल में तीर्थ यात्रा का मौका मिलेगा। श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अरुण कुमार ने इसकी जानकारी दी। हर साल हजारों हिन्दू तीर्थ यात्री अमरनाथ गुफा स्थित हिम शिवलिंग का दर्शन करने के लिए निकलते हैं। अमरनाथ गुफा दूर-दराज के तीर्थ यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रही है। तीर्थ यात्रियों को 13500 फुट से अधिक की ऊंचाई से होकर गुफा तक पहुंचना होता है। अरुण कुमार, जो राज्यपाल के प्रधान सचिव भी हैं, ने बताया कि पूरे रास्ते में सामुदायिक रसोईघरों की व्यवस्था होगी। इसके अलावा बेस कैम्प में भी तीर्थ यात्रियों के लिए रसोईघर की व्यवस्था होगी।
उन्होंने कहा कि अधिकारियों को बेस कैम्प की साफ-सफाई पर खास ध्यान रखने को कहा गया है। श्राइन बोर्ड ने अभी तक तीर्थ यात्रियों के लिए करीब 100 सामुदायिक रसोईघरों का पंजीकरण किया है। कई और लोगों ने ऐसे रसोईघर की स्थापना के लिए आवेदन करने का संकेत दिया है। यहां तीर्थ यात्रियों को मुफ्त भोजन कराया जाएगा। अरुण कुमार ने बताया कि शौचालयों की स्वच्छता पर खास ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि तीर्थ यात्री पॉलीथीन बैग इधर-उधर नहीं फेंकने के निर्देश का भरपूर पालन करेंगे और इलाके को प्रदूषण से मुक्त बनाए रखने में मदद देंगे। लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए बोर्ड ने जगह-जगह वाटर फिल्टर उपकरण लगाए हैं। सामुदायिक रसोईघर के आसपास भी ऐसे उपकरण लगाए गए हैं। प्रत्येक बेस कैम्प में 1400 तीर्थ यात्रियों के लिए ठहरने की व्यवस्था की गई है।





योग-5 || 4-प्राणायाम

21 04 2007

महर्षि पतंजलि ने कहा है, ‘श्वासप्रश्वासयो गतिविच्छेद: प्राणायम’ यानी प्राण की स्वाभाविक गति श्वास-प्रश्वास को रोकना प्राणायाम है। पतंजलि योग सूत्र के अनुसार योगी प्राणायाम के द्वारा आत्मा के प्रकाश में बाधक अविद्या को हटाता है। शरीर, मन तथा प्राण को शुद्ध करने के लिए प्राणायाम बहुत अच्छा साधन है। इसके निरंतर अभ्यास से अंतर्चेतना जागृत होती है। स्नायुमंडल की शुद्धि होती है। शरीर का कोई भी रोग ऐसा नहीं, जो प्राणायाम के अभ्यास से ठीक न किया जा सके।

प्राणायाम स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर अग्रसर होने का प्रवेश द्वार है। यह तो हम सभी जानते हैं कि हम श्वास लेते हैं और वायु में मिली हुई ऑक्सीजन , जिसकी शरीर को बहुत आवश्यकता होती है, ग्रहण करते हैं तथा उससे जीवनी शक्ति प्राप्त करते रहते हैं। यह क्रिया सोते-जागते निरंतर चलती रहती है।

वैसे तो सभी प्राणी जाने-अनजाने प्राणायाम करते रहते हैं। प्राणायाम में मुख्य रूप से तीन ही क्रियाएं होती हैं। 1. श्वास लेना 2. श्वास छोड़ना 3. उसे कुछ क्षण अंदर तथा बाहर रोकना।

इसी क्रिया को विधि अनुसार ध्यान तथा लगन से भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाता है, तो प्राणायाम कहलाता है। इससे शक्ति संपन्नता प्राप्त होती है।

हमारे शरीर में 72 हजार नस-नाड़िया हैं, जिनमें 10 विशेष हैं और उनमें भी तीन विशेषतम हैं। वास्तव में ये तीन नाड़ियां न होकर ‘स्नायुमंडल’ ही हैं। ऐसा विज्ञान भी मानता है। ये तीन हैं-

इड़ा या चन्द्र नाड़ी : यह शरीर के बाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह ठंडी है तथा मानव के विचारों का नियंत्रण करती है।

पिंगला या सूर्य नाड़ी : यह शरीर के दाएं भाग का नियंत्रण करती है। यह गर्म है तथा व्यक्ति में प्राण शक्ति का नियंत्रण करती है।

सुषुम्ना : यह मध्य नाड़ी है। मेरुदंड के मध्य में से होकर मूलाधार तक जाती है। न गर्म न ठंडी, परंतु दोनों के संतुलन में सहायक है। यह प्रकाश तथा ज्ञान देती है।

प्राणायाम का उद्देश्य इड़ा तथा पिंगला में ठीक संतुलन स्थापित करके सुषुम्ना के द्वारा प्रकाश तथा ज्ञान प्राप्त कराने में सहायता देना होता है। शारीरिक दृष्टि से इन तीनों नाड़ियों में ठीक-ठीक संतुलन, आरोग्य, बल-शांति तथा लंबी आयु प्रदान करने की क्षमता रहती है।

हमारे शरीर की सभी कोशिकाएं इड़ा, पिंगला या सुषुम्ना से किसी न किसी रूप में संबंधित हैं। इनमें ही श्वास-प्रश्वास के द्वारा वायु के परिभ्रमण से रक्त का संचार होता है। प्राय: श्वास प्रक्रिया के अंगों की दुर्बलता के कारण यह क्रिया उचित ढंग से नहीं हो पाती। फलत: अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।

प्राणायाम से न केवल इन अंगों की दुर्बलता दूर होती है, बल्कि उनमें शक्ति-संपन्नता बढ़ती है, जिसके कारण योगी अपने प्राणों तथा स्नायुमंडल पर नियंत्रण पाकर मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है।

लाभ : प्राणायाम का अभ्यास करने से फेफड़े मजबूत होते हैं, उनका लचीलापन बढ़ता है, अधिक से अधिक ऑक्सीजन शरीर को मिलती है तथा उसका उपयोग शरीर के विकार को बाहर निकालने में होता है।

प्राणायाम से मस्तिष्क के अंदर के स्नायुमंडल पर भी प्रभाव पड़ता है, मस्तिष्क से विकार दूर होते हैं। द्वंद्वों को सहन करने की शक्ति बढ़ती है, आत्मविश्वास पैदा होता है, स्मरणशक्ति प्रबल होती है तथा मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है।

शरीर के अन्य अंग आंख, कान, जीभ, गला आदि पर भी प्राणायाम का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है। प्राणायाम करने से आमाशय, लीवर, क्लामग्रंथि, गुर्दे तथा आंत स्वस्थ रहते हैं। इन अंगों में भी शुद्ध रक्त के परिभ्रमण की गति तेज होती है, जिससे विकार दूर होता है और कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

प्राणायाम का मन से भी घनिष्ठ संबंध है। प्राण पर नियंत्रण होने से मन पर सहज ही संतुलन प्राप्त हो जाता है। प्राणायाम एक प्रकार से श्वसन क्रियाओं का व्यायाम है, इसलिए इसे प्रात: काल शुद्ध व स्वच्छ वायु में खुले में करना चाहिए।





वृहस्पतिवार व्रत की आरती

21 04 2007

जय जय आरती राम तुम्हारी। राम दयालु भक्त हितकारी॥
जनहित प्रगटे हरि व्रतधारी। जन प्रहलाद प्रतिज्ञा पारी॥
द्रुपदसुता को चीर बढ़ायो। गज के काज पयादे धायो॥
दस सिर छेदि बीस भुज तोरे। तैंतीसकोटि देव बंदी छोरे॥
छत्र लिए सर लक्ष्मण भ्राता। आरती करत कौशल्या माता॥
शुक शारद नारदमुनि ध्यावैं। भरत शत्रुघन चँवर ढुरावैं॥
राम के चरण गहे महावीरा। ध्रुव प्रहलाद बालिसुर वीरा॥
लंका जीति अवध हरि आए। सब संतन मिलि मंगल गाए॥
सीय सहित सिंहासन बैठे। रामा। सभी भक्तजन करें प्रणामा॥





वृहस्पतिवार की अन्य कथा

21 04 2007

देवराज इंद्र को स्वर्गलोक के सिंहासन पर बैठने का गर्व बहुत आनंदित कर रहा था। एक दिन सिंहासन पर बैठे हुए देवराज इंद्र जब अपने अहंकार में डूबे थे, तभी देवों के गुरु वृहस्पतिदेव वहाँ पहुँचे। वृहस्पतिदेव को देखकर सभी देवता उनके सम्मान में उठकर प्रणाम करने लगे लेकिन देवराज इंद्र सिंहासन के अहंकार में डूबे रहे। वृहस्पतिदेव ने इंद्र के इस व्यवहार को अपना अपमान समझा और तुरंत वहाँ से बाहर चले गए।

वृहस्पतिदेव के लौट जाने पर दूसरे देवताओं ने देवराज इंद्र से कहा कि आपको इस तरह वृहस्पतिदेव का अनादर करके उन्हें यूँ क्रोधित नहीं करना चाहिए था। वृहस्पतिदेव के क्रोधित होने से हम सबको बहुत हानि हो सकती है।

देवताओं के कथन पर देवराज इंद्र को अपनी भूल पर पश्चाताप होने लगा। मन ही मन वे सोचने लगे- ‘स्वर्ग का सिंहासन उन्हें गुरु वृहस्पतिदेव के कारण ही मिला है। उनके क्रोधित होने से उनका सारा वैभव नष्ट हो जाएगा। यह सोच देवराज इंद्र कुछ देवताओं के साथ वृहस्पतिदेव के निवास स्थल पर पहुँचे। लेकिन उनके पहुँचने से पूर्व वृहस्पतिदेव अपनी ज्योतिष विद्या से उनके आगमन की बात जानकर अदृश्य हो गए।

इंद्र वृहस्पतिदेव को वहाँ न पाकर बहुत निराश हुए। उधर असुरों के राजा वृषराज को वृहस्पतिदेव के क्रोधित होकर कहीं चले जाने का पता चला तो तुरंत अपनी सेना लेकर उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण कर दिया। गुरु शुक्राचार्य की बुद्धिमानी से असुरों ने देवताओं को मारना शुरू कर दिया। वृहस्पतिदेव के साथ न होने से देवताओं की हार होने लगी।

देवराज इंद्र को स्वर्गलोक के सिंहासन पर वृषराज का अधिकार होता दिखाई देने लगा। तब देवराज इंद्र ने ब्रह्माजी के पास जाकर प्रार्थना की- ‘हे महाराज! हमें असुरों से बचाओ।’ ब्रह्माजी ने इंद्र से कहा- ‘इंद्र! तुमने गुरु वृहस्पतिदेव को क्रोधित करके अपनी पराजय को स्वयं आमंत्रित किया है। जब तक वृहस्पतिदेव न लौटें, तब तक तुम्हें त्वष्टा ब्राह्मण के विद्वान पुत्र विश्वनाथ को अपना गुरु बनाकर असुरों से युद्ध करना होगा। उसी स्थिति में तुम्हारा कल्याण हो सकता है।’

अपने रथ पर सवार होकर आकाश मार्ग से देवराज इंद्र विश्वनाथ के पास पहुँचे और उनसे गुरु बनने की प्रार्थना की। विश्वनाथ ने कहा- ‘देवराज! मैं अपने पिता की आज्ञा के बिना तुम्हारा गुरु नहीं बन सकता।’ देवराज ने तब त्वष्टा ब्राह्मण के पास पहुँचकर विश्वनाथ को गुरु पद स्वीकार कर लेने के लिए आज्ञा देने की प्रार्थना की।

त्वष्टा ने देवताओं की निश्चित पराजय जानकर अपने पुत्र विश्वनाथ को देवताओं का गुरु बनने की आज्ञा दे दी। विश्वनाथ के गुरु बन जाने से देवताओं की विजय हुई और वृषराज की पराजय।

विश्वनाथ के तीन मुँह थे। वे एक मुँह से भोजन करते थे, दूसरे से मदिरापान और तीसरे मुँह से सोमलता का रस पीते थे। कुछ दिनों के बाद देवराज इंद्र ने गुरु विश्वनाथ की आज्ञा से महायज्ञ प्रारंभ किया। उस महायज्ञ से देवराज इंद्र को असीम शक्ति मिलने वाली थी। विश्वनाथ ने यज्ञ प्रारंभ किया।

एक दिन एक असुरों ने एकांत पाकर विश्वनाथ से कहा- ‘गुरुराज! आपके पिता विद्वान ब्राह्मण अवश्य हैं, लेकिन आपकी माता असुर की कन्या हैं। इसलिए आपको यज्ञ करते समय एक आहुति असुरों के कल्याण के लिए भी देनी चाहिए।’ अब विश्वनाथ प्रतिदिन यज्ञ में असुरों के नाम से भी धीमे स्वर में आहुति देने लगे।

महायज्ञ से देवताओं को शक्ति नहीं मिली तो देवराज इंद्र ने वास्तविकता का पता लगाया। जब उन्हें पता चला कि विश्वनाथ असुरों के नाम की भी आहुति देते रहे हैं तो उन्होंने क्रोधित होकर विश्वनाथ के तीनों सिर काट डाले। तभी एक चमत्कार हुआ।

विश्वनाथ का मदिरापान करने वाला सिर भँवरा बना। भोजन करने वाला मुँह तीतर और सोमलता का रसपान करने वाला मुँह कबूतर बन गया। विश्वनाथ की मृत्यु होने से ब्रह्महत्या के प्रकोप से इंद्र का स्वरूप बदल गया। सभी देवता एक वर्ष तक प्रायश्चित करते रहे, लेकिन इंद्र का स्वरूप नहीं बदला।

तब सभी देवता मिलकर ब्रह्माजी के पास पहुँचे। ब्रह्माजी को साथ लेकर देवता वृहस्पतिदेव के घर गए और उस ब्रह्महत्या के चार भाग किए। ब्रह्महत्या का एक भाग पृथ्वी को दिया। उस भाग के कारण पृथ्वी कहीं ऊँची, कहीं नीची हो गई। पृथ्वी कहीं भी समतल नहीं रही। ब्रह्माजी ने पृथ्वी को एक वरदान दिया। पृथ्वी पर कहीं भी कोई गड्ढा होगा तो वह कुछ समय बाद स्वयं भर जाएगा।

ब्रह्माजी ने ब्रह्महत्या का दूसरा भाग वृक्षों को देते हुए कहा कि इस भाग के कारण वृक्षों से गोंद बहा करेगा। गोंद तो सभी वृक्षों से निकलता है, लेकिन गुगल वृक्ष का गोंद सर्वोत्तम माना जाता है। वृक्षों को ब्रह्माजी ने यह वरदान भी दिया कि एक बार सूख जाने पर अपनी जड़ों के कारण वे दोबारा हरे-भरे हो सकते हैं।

तीसरा भाग स्त्रियों को दिया गया। उस भाग के कारण स्त्रियाँ हर महीने ऋतुस्त्राव से पीड़ित होती हैं। ऋतुस्त्राव चार दिन चलता है। इस ऋतुस्त्राव के कारण स्त्रियाँ पहले दिन चांडालनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन धोबिन के समान रहती हैं। चौथे दिन स्नान करने के बाद स्त्रियाँ ऋतुस्त्राव से शुद्ध होती हैं।

ब्रह्महत्या का चौथा भाग जल को दिया गया। उस भाग के कारण फेन और शैवाल स्वयं जल के ऊपर आकर तैरने लगते हैं। जल को किसी भी चीज में डालकर उसमें मिश्रित होने का वरदान मिला। इस तरह ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त किया।

वृहस्पतिवार की यह कथा सुनने वाले की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। वृहस्पतिवार कथा सुनने व सुनाने वाले के सभी कृष्ट दूर होते हैं। इस कथा के सुनने से विद्यालाभ होता है तथा मनुष्य विद्वान बनता है।





वृहस्पतिवार व्रतकथा

21 04 2007

कुशीनगर में धनपतराय नाम का एक धनी व्यक्ति रहता था। उसके घर में कोई अभाव नहीं था। धनपतराय का व्यापार दूर-दूर तक फैला हुआ था। धनपतराय की पत्नी मालती बहुत लोभी और ईष्या-द्वेष करने वाली थी। घर में भंडार भरे होने पर भी वह किसी निर्धन या भिक्षु को कुछ नहीं देती थी।

एक दिन एक संन्यासी धनपतराय के घर पर आया। उसने दरवाजे पर खड़े होकर भिक्षा के लिए आवाज लगाई। धनपतराय की पत्नी मालती उस समय आँगन लीप रही थी। उसने कहा- ‘महाराज! इस समय तो मैं आँगन लीप रही हूँ। अत: आपको भिक्षा नहीं दे सकती।’ संन्यासी खाली हाथ लौट गया।

कुछ दिनों बाद भ्रमण करते हुए वही संन्यासी फिर धनपतराय के घर पहुँचा और दरवाजे पर खड़े होकर भिक्षा देने के लए आवाज लगाई। मालती आँगन में बैठी अपने बेटे को खाना खिला रही थी। उसने संन्यासी से कहा- ‘महाराज! मैं अपने बेटे को भोजन करा रही हूँ। इस समय आपको भिक्षा नहीं दे सकती। जब मुझे अवकाश हो जाए तो आप आना।’ संन्यासी फिर निराश होकर खाली हाथ लौट गया।

कुछ दिनों बाद संन्यासी फिर धनपतराय के घर पहुँचा और द्वार पर खड़े होकर भिक्षा देने के लिए पुकारा। मालती हाथ में झाडू लिए दरवाजे पर आकर बोली- ‘महाराज! घर में झाडू-बुहारी कर रही हूँ। उसके बाद बहुत से वस्त्र धोने हैं। आज तो मुझे बिलकुल फुर्सत नहीं। आज तो मैं आपको भिक्षा नहीं दे सकती। फिर कभी फुर्सत के समय आना।’

मालती के वचन सुनकर संन्यासी मन ही मन मुस्कराया और धीरे से बोला- ‘मैं तुम्हें ऐसा उपाय बता सकता हूँ जिससे तुम्हें अवकाश ही अवकाश हो जाएगा। भगवान की लीला से तुम्हारे सभी काम अपने आप पूरे हो जाया करेंगे और फिर तुम पूरा दिन आराम से बैठकर गुजार सकोगी।’

संन्यासी की बात सुनकर मालती ने खुश होते हुए कहा- ‘महाराज! यदि ऐसा हो जाए तो मैं आपको बहुत-सा धन, अन्न और वस्त्र दान कर दूँगी। आप जल्दी से मुझे वह उपाय बता दीजिए।’

संन्यासी ने मन ही मन मुस्कराते हुए धीरे से कहा- ‘तुम वृहस्पतिवार को खूब धूप निकलने पर बिस्तर से उठना। फिर घर में झाडू लगाकर सारा कूड़ा घर के एक कोने में एकत्र कर देना। उस दिन घर में कहीं लीपना नहीं। उस दिन परिवार के सभी पुरुष दाढ़ी अवश्य बनवाएँ। भोजन बनाकर तुम चूल्हे के पीछे रख देना। शाम को अँधेरा होने के बाद दीपक जलाना और वृहस्पतिवार को पीले वस्त्र बिलकुल न पहनना। उस दिन पीले रंग की कोई वस्तु या अन्न नहीं खाना। यदि तुम ऐसा करोगी तो तुम्हें कभी कोई काम नहीं करना पड़ेगा और फिर तुम्हें अवकाश ही अवकाश होगा।’

अगले वृहस्पतिवार को मालती ने अपने पति और घर के दूसरे पुरुषों को देर से उठाकर, स्नान करके दाढ़ी के बाल काटने के लिए कह दिया। स्वयं भी उस दिन खूब धूप निकल आने पर ही उठी। भोजन बनाकर उसने चूल्हे के पीछे रखा और घर में दूध की खीर बनाकर सबको पेटभर खिलाई।

कई मास तक मालती हर वृहस्पतिवार को ऐसा ही करती रही। अचानक उसके दुष्करर्मों से उसके पति को व्यवसाय में हानि हुई। घर में चोरी होने से वस्त्र-आभूषण और धन चला गया। नौकर-चाकर उन्हें छोड़कर चले गए। घर में अन्न का दाना तक नहीं रहा। लोगों से भिक्षा माँगकर पेट भरने की नौबत आ गई।

मालती अपने घर के बाहर उदास बैठी थी। उसका पति किसी संबंधी से धन उधार लेने गया था। उसी समय संन्यासी वहाँ पर आया। उसने भिक्षा पात्र आगे करते हुए कहा- ‘भगवान की अनुकम्पा से अब तुम्हें बहुत अवकाश होगा। इसलिए हे देवी, जल्दी से उठकर मुझे थोड़ी-सी भिक्षा दे दो।’

उसे देखते ही मालती संन्यासी के चरणों में गिरकर बोली- ‘महाराज! मुझे क्षमा करें। मैंने झूठ बोलकर आपको भिक्षा देने से इनकार किया था। मेरी गलती से मेरे घर की धन-संपत्ति, अन्न और वैभव सब नष्ट हो गया। महाराज! मुझे कोई ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरा घर पहले की तरह अन्न, वस्त्र और धन, वैभव से भर जाए। यदि आपने कोई उपाय नहीं बताया तो मैं आपके चरणों में सिर पटक-पटककर अपने प्राण दे दूँगी।’

संन्यासी ने मन ही मन मुस्कराते हुए कहा- ‘हे देवी! मेरे चरण छोड़ो और मेरी बात ध्यान से सुनो। भगवान वृहस्पति ही तुम्हारा कल्याण कर सकते हैं इसलिए प्रत्येक वृहस्पतिवार को उनका व्रत करते हुए उनकी पूजा-अर्चना पीले पुष्पों से अवश्य करो। केले की पूजा करने से अनेक शुभ फल मिलते हैं। वृहस्पतिवार को घर में कोई पुरुष दाढ़ी व सिर के बाल न कटवाए। सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि करके, घर के आँगन को गोबर से लीपकर पूजा करे। शाम को घी का दीपक अवश्य जलाना। तुम विधिवत वृहस्पतिवार का व्रत करोगी तो तुम्हारे घर में धन-धान्य की वर्षा होगी। सभी कामनाएँ पूरी होंगी और सभी को विद्या का लाभ होगा।’

इतना कहते ही संन्यासी अंतर्धयान हो गए तो मालती आश्चर्यचकित रह गई। उसने प्रत्येक वृहस्पतिवार को विधिवत व्रत किया। वृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से उसके घर में धन-धान्य की वर्षा होने लगी। खोया हुआ मान-सम्मान और वैभव पुन: प्राप्त हो गया।

वृहस्पतिवार को जो भी स्त्री-पुरुष वृहस्पतिदेव की विधिवत पूजा करते हैं, उनके घर में सुख-संपत्ति का भंडार भरा रहता है और विद्या के लाभ से अज्ञानता नष्ट होती है। समाज में मान-सम्मान बढ़ता है।





॥ वृहस्पतिवार व्रत ॥

21 04 2007

किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार के योग के दिन इस व्रत की शुरुआत करना चाहिए। इस दिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। नियमित सात व्रत करने से गुरु ग्रह से उत्पन्न होने वाला अनिष्ट नष्ट होता है। कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्ध होकर मनोकामना पूर्ति के लिए बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए। पीले रंग के चंदन, अन्न, वस्त्र और फूलों का इस व्रत में विशेष महत्व होता है।

वृहस्पतिवार व्रत कैसे करें
सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। शुद्ध जल छिड़ककर पूरा घर पवित्र करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर वृहस्पति की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात पीत वर्ण के गंध-पुष्प और अक्षत से विधिविधान से पूजन करें। इसके बाद निम्न मंत्र से प्रार्थना करें-
धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग।
विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोस्तु ते॥

तत्पश्चात आरती कर व्रतकथा सुनें। अंत में प्रसाद वितरण कर पहले ब्राह्मण को भोजन कराएँ फिर स्वयं भोजन ग्रहण करें।

वृहस्पतिवार व्रत के दिन क्या करें
इस दिन एक समय ही भोजन किया जाता है। व्रत करने वाले को भोजन में चने की दाल अवश्य खानी चाहिए। वृहस्पतिवार के व्रत में कंदलीफल (केले) के वृक्ष की पूजा की जाती है।

वृहस्पतिवार व्रत के दिन क्या न करें
स्त्रियों को इस दिन कपड़े तथा सिर नहीं धोना चाहिए। स्त्रियों को इस दिन तेल, कंघी व चोटी भी नहीं करना चाहिए।

व्रत लाभ
वृहस्पतिवार व्रत के पूजन से स्त्री-पुरुष को वृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से धन-संपत्ति का अपार लाभ होता है। परिवार में सुख तथा शांति रहती है। स्त्रियों के लिए वृहस्पतिवार का व्रत बहुत शुभ फल देने वाला है। वृहस्पतिदेव की पूजा के पश्चात कथा सुनने का विशेष महत्व है। वृहस्पतिवार के व्रत करने और कथा सुनने से विद्या का बहुत लाभ होता है। वृहस्पतिवार का नियमित व्रत रखने वाली स्त्री की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।